हरित क्रांति से आप क्या समझते हैं? | harit kranti se aap kya samajhte hain

हरित क्रांति (Green revolution)

भारत में हरित क्रांति से तात्पर्य वर्ष 1966-67 के नई कृषि नीति द्वारा अपनाए गए अधिक उपज देने वाले उन्नत बीजों के प्रयोग एवं बहुफसली कार्यक्रम के माध्यम से उत्पादन में तीव्र वृद्धि से था। तीसरी एवं चौथी पंचवर्षीय योजना के मध्य का समय भारतीय कृषि की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण था। इसी समय नई कृषि रणनीति काफी प्रचलित हुई। उन्नत प्रजातियों के गेहूँ एवं धान के बीज हरित क्रांति के उत्प्रेरक थे, साथ ही रासायनिक खाद, सिंचाई एवं नई तकनीकी पर विशेष बल दिया गया। हरित क्रांति से संबंधित महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं-
  • अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. विलियम गाड को हरित क्रांति का नाम देने का श्रेय प्राप्त है।
  • डॉ. नार्मन बोरलाग को हरित क्रांति का जनक माना जाता है।
  • भारतीय परिप्रेक्ष्य में डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक माना जाता है।
  • हरित क्रांति का प्रभाव मुख्यतः गेहूँ और धान पर दिखाई पड़ता है।
  • हरित क्रांति का प्रभाव विशेषकर पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, गंगानगर तक सीमित था।
  • हरित क्रांति की सफलता का मुख्य कारण अधिक उपज देने वाली किस्मों का प्रयोग था।
  • भारत में हरित क्रांति का प्रारंभ वर्ष 1966 में खरीफ फसल से हुई।
  • हरित क्रांति का प्रथम चरण गेहूँ तक सीमित था तथा दूसरे चरण में अन्य फसलों, जैसे- धान, ज्वार, बाजरा, जूट, कपास तथा गन्ना में दिखाई पड़ा।
  • तिलहन, कपास, जूट पर इसका प्रभाव कम दिखाई देता है।
  • उच्च उपज देने वाली किस्म कार्यक्रम (HYVP) 5 फसलों- गेहूँ, धान, ज्वार, बाजरा तथा मक्का तक सीमित था।

हरित क्रांति की विशेषताएँ

हरित क्रांति की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
  • अधिक अन्न उपज वाली उन्नत बीज का प्रयोग संभव हुआ।
  • पैदावार बढ़ाने के लिये रासायनिक खादों के प्रयोग में बढ़ोतरी की गई।
  • गहन कृषि पर बल दिया गया। फसलों के लिये सिंचाई की व्यवस्था में सुधार किया गया।
  • फसल-चक्र को बढ़ावा दिया गया।
  • भू-संरक्षण से संबंधित कार्यों की व्यवस्था की गई
  • किसानों को बैंकों से ऋण सुविधाएँ प्रदान की गईं जिससे वे बीजों एवं उर्वरक की खरीद करके खाद्य उत्पादन में वृद्धि कर सकें।
  • खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हो सका।

हरित क्रांति के प्रभाव

हरित क्रांति से खाद्यान्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता आई, खाद्य उत्पादन में वृद्धि संभव हुई लेकिन इसका मृदा एवं पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिला।

हरित क्रांति के सकारात्मक प्रभाव
हरित क्रांति के सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं

खाद्यान्न आत्मनिर्भरता
हरित क्रांति से पूर्व भारत की खाद्यान्न उत्पादन संतोषजनक स्थिति में तो थी लेकिन हरित क्रांति के बाद पैदावार में तीव्र वृद्धि हुई। वर्ष 1960-61 में गेहूँ एवं चावल का उत्पादन क्रमशः 11 मिलियन एवं 35 मिलियन टन था किंतु वर्ष 1997-98 में गेहूँ का उत्पादन 66 मिलियन टन तथा चावल का उत्पादन 88 मिलियन टन बढ़ गया। कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग द्वारा जारी किये गए वर्ष 2016-17 के चौथे अग्रिम अनुमानों के अनुसार, देश ने 275.7 मिलियन टन के स्तर पर खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन किया है।

राष्ट्रीय आय में वृद्धि
खाद्यान्न आधिक्य से खाद्यान्नों का निर्यात किये जाने के कारण विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है और सकल घरेलू उत्पाद बढ़ता है जिससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। कृषि निर्यात वर्ष 2012-13 के 2,27,193 करोड़ रुपए से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2016-17 में लगभग 0.15% की वृद्धि दर्ज कराते हुए 2,27,554 करोड़ रुपए हो गया । बासमती चावल, मसालों, चावल (गैर-बासमती), कच्चा कपास, चीनी आदि के मूल्यों में हुई वृद्धि के कारण वर्ष 2016-17 के दौरान कृषि निर्यात मूल्य में वृद्धि हुई।

खाद्य सुरक्षा में सहायक
हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि प्रदान किया जिससे बढ़ती जनसंख्या के लिये खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित हो सकी।

रोज़गार में वृद्धि
हरित क्रांति के परिणामस्वरूप रोज़गार में भी वृद्धि हुई। सिंचाई के विकास, उर्वरक का उत्पादन, उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग एवं विपणन हेतु श्रम बल की आवश्यकता महसूस हुई जिससे बेरोजगारों को रोज़गार प्राप्त हुआ तथा अधिकांश कृषकों का रुझान कृषि क्षेत्र में बढ़ा। फलस्वरूप कृषि क्षेत्र की आय में वृद्धि हुई।

हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव
हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं-
  • गेहूँ एवं चावल की कृषि पर ज्यादा बल दिया गया जिससे अन्य फसलों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में विषमता बढ़ी।
  • उन्नत बीज एवं तकनीकी का लाभ बड़े कृषकों को ही मिला। आय की कमी के कारण लघु कृषक इससे वंचित रहे।
  • पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु के कुछ ज़िले ही ज्यादा लाभान्वित हुए, शेष भारत में हरित क्रांति का प्रभाव विरल ही देखने को मिला।
  • हरित क्रांति ने कृषि का व्यवसायीकरण कर दिया। परिणामस्वरूप कृषि से जुड़े परंपरागत मूल्य विलुप्त होते गए।
  • उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अधिक उपयोग से मृदा प्रभावित हुई जिससे पर्यावरण दूषित होने से मानव स्वास्थ्य भी प्रभावित हुआ।
  • अत्यधिक सिंचाई से भूमिगत जल स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • हरित क्रांति में वर्षा जल के संरक्षण से संबंधित कार्यक्रम का अभाव था जिससे भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन हुआ।

द्वितीय हरित क्रांति (Second green revolution)

  • पहले चरण की हरित क्रांति से खाद्यान्न क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ किंतु यह कुछ ही फसलों तक सीमित था। इससे कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की स्थिति प्राप्त हुई लेकिन धीरे-धीरे इस क्रांति का प्रभाव कम हो गया। कृषि उत्पादन में ह्रास होने के कारण अर्थव्यवस्था में एक गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई। बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण खाद्यान्नों की मांग बढ़ी। खाद्य सुरक्षा एवं कृषि क्षेत्र में अस्थिरता, क्षेत्रीय असंतुलन, पर्यावरणीय हितों को ध्यान में रखते हुए कृषि क्षेत्र में समग्र विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सबसे पहले ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने वर्ष 2006 में द्वितीय हरित क्रांति का आह्वान किया। इसको ध्यान में रखकर डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने निम्नलिखित बातों पर बल देने की बात की उत्पादन की तकनीकों का प्रयोग एवं ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देना।
  • किसानों को उचित मूल्य पर साख की व्यवस्था।
  • मिट्टी को अधिक उर्वर बनाना।
  • द्वितीय हरित क्रांति में निम्नलिखित पहलू पर ध्यान देने की आवश्यकता थी
  • लक्षित समय में कृषि उत्पादन को दुगुना करना तथा पर्यावरण की दृष्टि से पोषणीय खेती पर बल।
  • लघु एवं सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर सस्ती तकनीक एवं सिंचाई व्यवस्था को सुनिश्चित करना।
  • दलहन, तिलहन, फल तथा सब्जियों के उत्पादन पर बल दिया जाना।

द्वितीय हरित क्रांति की संकल्पना

द्वितीय हरित क्रांति को दो अर्थों में लिया जाता है-

पोषणीय कृषि के रूप में
इसमें निम्नलिखित बातों को शामिल किया गया था
  • संतुलित फसल चक्र पद्धति पर बल देना।
  • जल एवं पर्यावरण संरक्षण।
  • रासायनिक उर्वरक के स्थान पर बायो उर्वरक पर बल देना।
  • रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग के स्थान पर बायो कीटनाशकों का प्रयोग करना।

कृषि से जुड़ी अन्य वस्तु
पूर्ववर्ती हरित क्रांति पाँच खाद्यान्नों (गेहूँ, धान, ज्वार, बाजरा तथा मक्का) तक सीमित थी। लेकिन दूसरी हरित क्रांति में कृषि से संबद्ध क्षेत्रों को केंद्र में रखकर इसके विस्तार की बात की गई, जैसेपशुपालन, मत्स्यन एवं रेशम उद्योग आदि। द्वितीय हरित क्रांति संपूर्ण कृषि क्षेत्र में एक बहुत बड़ा कदम था। इसके माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था के कृषि क्षेत्र में रोजगार, आय एवं उत्पादकता में वृद्धि हुई। हरित क्रांति की आज भी प्रासंगिकता है। इससे पूर्वी क्षेत्रों में कृषि विस्तार, शुष्क जोतों को बढ़ावा, सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था जैसे विकासात्मक कार्यक्रम पर बल दिया गया। कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा मिला। लघु एवं सीमांत किसानों में उच्च तकनीक एवं पूंजी के अभाव को दूर करने का प्रयास किया गया। निष्कर्षतः द्वितीय हरित क्रांति से कृषि क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ी, किसानों की आय में वृद्धि हुई, कृषि के निगमीकरण एवं प्रसंविदा (Censorship) खेती को बढ़ावा मिला।
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