भू-संतुलन किसे कहते हैं? | bhu santulan kise kahate hain

भू-संतुलन किसे कहते हैं

धरातल पर उच्च पर्वत, विषम पठार, समतल मैदान, झीलें, सागरीय बेसिन आदि स्थित हैं। इनकी ऊँचाई तथा आकृति समान नहीं है फिर भी भूतल पर समस्त स्थलाकृतियों के मध्य 'संतुलन एवं स्थिरता बनी रहती है, यह निःसन्देह आश्चर्यजनक है।

भू-संतुलन

परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर स्थित क्षेत्रों (पर्वत, पठार एवं मैदान) तथा गहराई में स्थित क्षेत्रों (झील, सागर आदि) के मध्य भौतिक अथवा यांत्रिक स्थिरता की दशा को ही भूसंतुलन कहते है।
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'Isostasy simply means a mechanical stability between the upstanding parts and lowlying basins on the rotating earth.
"lsostasy" ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'समान खड़ा होना' (Equal standing)। इसे विद्वानों ने 'भूसंतुलन या 'समस्थिति' नाम दिया है।

भू-संतुलन शब्द का प्रयोग

भूसंतुलन शब्द का सर्वप्रथम उपयोग अमेरिका के प्रसिद्ध भूगर्भवेत्ता सर जॉर्ज डटन ने 1889 में किया। उनका विचार था कि घूमती हुई पृथ्वी पर ऊपर उठे हुए तथा निचले भूभागों के बीच एक संतुलन की स्थिति होनी चाहिए। इस संतुलन के लिए उन्होंने सोचा कि ऊपर उठे भाग अपेक्षाकृत हल्के पदार्थ द्वारा निर्मित होने चाहिए अन्यथा पृथ्वी पर ऊंचे-नीचे भूखण्ड अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकते।
डटन के अनुसार ऊंचे उठे भूभागों का कम तथा नीचे धंसे भूभागों का घनत्व अधिक होगा, तभी सबका भार एक तल पर बराबर होगा। इस रेखा अथवा आधार तल को समदाब तल /समतोल तल अथवा क्षतिपूर्ति तल कहा जा सकता है।

भू-संतुलन संकल्पना का प्रादुर्भाव

संतुलन का विचार विद्वानों के मस्तिष्क में उस समय आया जब सर्वप्रथम (1735-45) फ्रान्सीसी विद्वान पीयरे ब्रुगैर (Pierre Bruguer) ने एण्डीज पर्वत की चिम्ब्राजो चोटी का उत्तर व दक्षिण दोनों ओर भूसर्वेक्षण किया तथा उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उसने पाया कि एण्डीज की चिम्बाजो चोटी साहुल को बहुतकम आकर्षित कर रही है। लगभग एक शताब्दी बाद 1859 में गंगा-सिन्धु के मैदान में हिमाचल के पास अक्षांशों का निर्धारण करते समय सर्वेयर जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट के सामने ऐसी ही गुरुत्व की विसंगति की समस्या आई। इसी समय 1849 में अमेरिका में 'हेफोर्ड, बोवी तथा जर्मनी के हैलमर्ट ने भी अपने भगणितीय सर्वेक्षण के दौरान इसी तरह की विसंगति युक्त परिणाम प्राप्त किए। अत: विद्वानों का ध्यान भूसंतुलन संकल्पना की ओर गया।

प्राट Pratt) की संकल्पना
सन् 1869 में गंगा-सिन्धु के मैदान में प्राट के निर्देशन में भूगणितीय सर्वेक्षण किया जा रहा था। कल्याण व कल्याणपुर नामक दो स्थानों के अक्षांश निर्धारण हेतु त्रिभुजीकरण एवं खगोलीय विधियों द्वारा किये गये माप के निम्न परिणाम प्राप्त हुए।

त्रिभुजीकरण विधि द्वारा

5°23'

42.294"

खगोलीय विधि द्वारा

5°23'

37.0.58"

 

अन्तर

5.236"


उक्त अन्तर को देखकर प्राट के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कल्याण हिमालय के निकट (96 किमी.) स्थित है तथा कल्याणपुर, कल्याण से दक्षिण में 599 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। जब प्राट ने हिमालय की निकटता के कारण साहु ल रेखा पर उसके आकर्षण गणना की शैलों के औसत घनत्व 2.7 के बराबर मानकर दुबाराकी तो कल्याण व कल्याणपुर के मध्य का अन्तर 5.236" से घटने के बजाय 15.885" बढ़कर आया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि साहुल रेखा का कम झुकाव हिमालय में आकर्षण की कमी के कारण था।
प्राट ने समस्या के समाधान हेतु दो विकल्प दिए।
  1. हिमालय पर्वत की शैलों का घनत्व उतना (2.7) नहीं है जितना माना गया।
  2. पर्वतीय उच्च भाग के अधिक पदार्थ का संतुलन उसके नीचे कम घनत्व वाले पदार्थ से होता है।
प्राट ने माना कि पर्वतों का घनत्व पठारों से कम, पठारों का घनत्व मैदानों से कम तथा मैदानों का घनत्व समुद्र तल से कम होता है। स्पष्ट है प्राट ने ऊंचाई तथा घनत्व में उल्टा अनुपात माना है। प्राट ने माना कि पृथ्वी के आंतरिक भाग में एक क्षतिपूर्ति तल (Leavo of compensation) होता है। इस तल के तल ऊपर घनत्व में अंतर होता है परन्तु इस तल पर सभी का घनत्व समान होता है। चित्र में क्षतिपूर्ति तल के सहारे 'अ' तथा 'ब' दो स्तम्भ है। 'अ' का घनत्व कम तथा 'ब' का घनत्व अधिक है। इस प्रकार प्राट ने सिद्ध करने का प्रयास किया कि पृथ्वी पर जो स्तम्भ जितना ऊंचा होगा उसका घनत्व उतना ही कम होगा तथा जो भाग जितना नीचा होगा उसका घनत्व उतना ही अधिक होगा।
प्राट ने स्पष्ट किया की पृथ्वी के विभिन्न उच्चावच स्थिर इसलिए है क्योंकि उनके घनत्व में अंतर होता है परन्तु उनका भार पृथ्वी के आंतरिक भाग में क्षतिपूर्ति तल पर बराबर होता है। अपनी संकल्पना कि पुष्टि के लिए उन्होंने विभिन्न धातुओं के टुकड़े लेकर एक प्रयोग किया। उन्होंने एक टब में पारा भरकर उस पर विभिन्न घनत्व परन्तु समान भार वाले अनेक धातुओं के टुकड़े तैरा दिए। प्रत्येक टुकड़े का पारे में समान गहराई तक प्रवेश था परन्तु पारे के ऊपर टुकड़े की ऊँचाइयां भिन्न-भिन्न थी।
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प्राट के मतानुसार पृथ्वी अध: स्तर (घनत्व 3.3) रूपी द्रव में पर्वत, पठार, मैदान, समुद्री भाग आदि इन्ही टुकड़ो की भांति तैर रहे है। इनके आधार द्रव में एक निश्चित गहराई पर समान रूप में स्थित है। इस प्रकार प्राट ने समान गहराई किन्तु विभिन्न घनत्व वाले स्तम्भों (Columns of uniform depth and varying density) की कल्पना की।

एयरी की संकल्पना
एयरी की संतुलन संकल्पना तैराकी के सिद्धांतों पर आधारित है। आर्किमिडीज के तैराव सिद्धांत के अनुसार तैरती हुई वस्तु अपने द्रव्यमान के बराबर अपने नीचे से द्रव्यमान को हटा देती है। यदि प्लावी हिम शैल (Iceberg) जल में तैरता है तो उसका 9वां भाग पानी में डूबा रहता है तथा एक भाग ऊपर उठा रहता है। यदि इस सिद्धांत के आधार पर सियाल (Sial) के सीमा (Sima) पर तैरने की व्याख्या करें तो स्पष्ट होता है कि सियाल का 9वां भाग सीमा के भीतर डूबा रहेगा। इसी आधार पर एयरी ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन किया। एयरी के उक्त मतानुसार यदि हिमालय के डूबे हुए भाग की गणना तैराकी के सिद्धान्त के आधार पर करें तो तथ्य स्पष्ट हो जायेगा। हिमालय की ऊँचाई 8848 मीटर है तथा मैरामा (क्षति पूर्ति तल) में डूबा हुआ भाग 8848x9 = 79632 मीटर होगा। अधिक डूबे हुए भाग से ऊपर का हिमालय संतुलन की अवस्था में रहता है।
एयरी ने स्पष्ट किया कि हिमालय हल्के पदार्थों का बना है। इसकी जड़ काफी गहराई तक ग्लासी मैरामा में प्रवेश किए हुए है। फलस्वरूप संतुलन की स्थिति विदयमान है। हिमालय के आधार पर एयरी ने बताया कि धरातल के सभी ऊँचे भाग अधिक गहराई तक तथा नीचे भाग कम गहराई तक डूबे हैं।
एयरी ने बताया कि पृथ्वी के विभिन्न भूखण्डों की शैले लगभग एक ही घनत्व की है। प्रयोगों से भी एयरी की बात सत्य प्रमाणित होती है। खान खोदने वालों का अनुभव है कि ऊपर से नीचे तक शैलों का घनत्व लगभग एक समान रहता है।
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एयरी ने अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए समान घनत्व किन्तु विभिन्न ऊँचाई वाले लोहे के टुकड़ों को पारे से भरे बेसिन में डुबोया। ये टुकड़े अपने आकार के अनुसार भिन्न-भिन्न गहराई तक डूबते गए। प्रयोग के लिए हम लोहे की जगह लकड़ी के भी समान घनत्व एवं विभिन्न मोटाई के टुकड़े ले सकते है वे भी भिन्न-भिन्न गहराई तक डूबते नजर आयेंगे। लगभग यही व्यवस्था स्थल खण्डों के सम्बन्ध में लागू होती है। इस प्रकार एयरी ने विभिन्न गहराई किन्तु समान घनत्व वाले स्तम्भों (columns of uniform density with varying depth) की कल्पना की।

एयरी तथा प्राट की संकल्पना में अन्तर
एयरी के अनुसार धरातल के उच्चावच पर्वत, पठार, मैदान, समुद्र तली आदि सभी का घनत्व समान हैं केवल उनकी ऊंचाई में अन्तर होता है। स्थल भाग जितने अधिक ऊँचे होते हैं उतने ही अधिक गहराई में सीमा (क्षतिपूर्ति तल) में डूबे रहते हैं। जबकि प्राट के अनुसार भूपटल के उच्चवचों के घनत्व में ऊँचाई के अनुसार भिन्नता होती है। जो स्थल भाग अधिक ऊँचे हैं उनका घनत्व कम है। ये क्षतिपूर्ति में समान गहराई पर डूबे रहते हैं।
बोवी (Bowie) ने इन दोनों के विचारों की तुलना सरल शब्दों में की हैं - 'एयरी समान घनत्व और विभिन्न गहराइयों में परन्तु प्राट समान गहराई परन्तु विभिन्न घनत्व में विश्वास करते हैं।
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हेफोर्ड एवं बोवी की संकल्पना
हेफोर्ड तथा बोवी का विचार प्राट के विचारों से साम्य रखता है। हेफोर्ड के अनुसार पृष्ठ के नीचे अलग-अलग घनत्व के भाग विद्यमान हैं। परन्तु धरातल के नीचे कुछ गहराई पर एक ऐसा तल है जिसके ऊपर घनत्व में अन्तर होता है तथा नीचे की तरफ घनत्व समान होता है। इसको हेफोर्ड ने 'क्षतिपूर्ति तल' (Level of compensation) बताया है। इस तल के उपर घनत्व तथा ऊँचाई के साथ उल्टा अनुपात होता है। क्षतिपूर्ति तल 100 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है। इस तल के उपर कम घनत्व वाले चट्टानी भागों की ऊँचाई अधिक तथा अधिक घनत्व वाले चट्टानी भागों की ऊंचाई कम होगी।
बोवी (Bowie) ने अपने सिद्धांत की पुष्टि के लिए एक प्रयोग किया। उन्होंने जस्ता, पाइराइट, चांदी, टिन, लोहा, तांबा, सीसा, निकल आदि धातुओं के टुकड़े के लिए जिनकी लम्बाई में भिन्नता तथा मोटाई एवं चौड़ाई समान थी। इनको पारे से भरे बेसिन में डूबोया। जिसका घनत्व अधिक था वे कम ऊँचाई तक तथा जिसका घनत्व कम था वे अधिक ऊंचाई तक स्थित थे। इस प्रयोग के आधार पर उन्होंने भूतल के वर्तमान वितरण को समझाने का प्रयास किया। बोवी ने स्पष्ट किया कि पर्वत, पठार, मैदान तथा समुद्र तली 100 किलोमीटर की गहराई में एक तल (level) के सहारे बराबर रहते हैं। परन्तु धरातल पर जिनका घनत्व कम है वे अधिक ऊँचाई तक विस्तृत हैं। पर्वतों का घनत्व सबसे कम है अत: वे सबसे ऊँचे उठे हुए हैं, पठार, मैदान तथा समुद्र तली की स्थिति इसके विपरीत है।
हेफोर्ड तथा बोवी की संकल्पना की निम्नानुसार आलोचना हुई -
  1. उन्होंने क्षतिपूर्ति तल की कल्पना 100 किलोमीटर की गहराई पर थी, इतनी गहराई पर स्थलरूपों की जड़ें अपनी मूलावस्था में विद्यमान नहीं रह सकती क्योंकि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में गहराई के साथ ताप में वृद्धि होती है। अत: 100 किलोमीटर की गहराई पर चट्टानें ठोस अवस्था में नहीं रह सकती।
  2. हेफोर्ड तथा बोवी के अनुसार भूतल पर स्थलरूप उर्ध्वाधर अवस्था में है जबकि शैलों के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि इनमें क्षैतिज स्तरीकरण हुआ है।

आर्थर होम्स की संकल्पना
आर्थर होम्स का विचार भी सर जॉर्ज एयरी के मत से मिलता जुलता है। जो भाग अधिक ऊँचे हैं उनका घनत्व कम तथा जो भाग नीचे हैं उनका घनत्व अधिक होता है। भुकम्प विज्ञान के आधार पर होम्स ने पृथ्वी के भीतर विभिन्न घनत्व की परतों का पता लगाया। होम्स के अनुसार पर्वतीय क्षेत्र के नीचे सियाल परत की गहराई 110 किलोमीटर, तटवर्ती मैदानों के नीचे 10-12 किलोमीटर तथा समुद्री तली के नीचे सियाल परत बहुत पतली होती है, प्रशान्त महासागर की तल के नीचे सियाल परत नहीं के बराबर है। होम्स के अनुसार सियाल का घनत्व 2.70 सीमा का घनत्व 3.00 तथा सीमा के निचले भाग का घनत्व 3.40 है। होम्स के अनुसार पर्वत, पठार, मैदान आदि का निचला भाग सीमा में प्रवेश किए हुए है। पर्वतों की जड़ें सीमा में काफी गहराई तक स्थित हैं जबकि मैदानों, पठारों एवं समुद्र तली की स्थिति इसके विपरीत है।
होम्स ने बताया कि ऊँचे उठे भाग इसलिए स्थित हैं क्योंकि उनके नीचे अधिक गहराई तक कम घनत्व वाले पदार्थ होते हैं। होम्स के अनुसार व्यवहार में यद्यपि भूतल पर संतुलन की स्थिति पूर्णरूपेण नहीं पाई जाती, तथापि संतुलन की दशा दृष्टिगत होती है।
भूतल पर संतुलन स्थायी रूप से विद्यमान नहीं है, क्योंकि भूगर्भिक शक्तियों इसमें अव्यवस्था उत्पन्न करती रहती हैं। धरातल पर विद्यमान विषम स्थलाकृतियों में संतुलन पृथ्वी की अभ्यांत्रिक प्रक्रिया पर निर्भर है इसकी सत्यता का ज्ञान तब तक सम्भव नही हो सकता जब तक हमे भूगर्भ के विषय में पूर्व ज्ञान ना हो।
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भूसंचलन एवं परिणाम स्वरूप संरचनात्मक रूप

भूतल पर हर क्षण परिवर्तन होते रहते हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। ये परिवर्तन पृथ्वी तल पर अन्तर्जात एवं बहिर्जात बलों द्वारा होते हैं। अन्तर्जात बल पृथ्वी तल पर असमानताओं को सृजित करते है जबकि बहिर्जात बल समतल स्थापक बल कहलाते है। स्थलरूपों को प्रभावित करने वाले बलों को निम्नानुसार विभाजित किया जा सकता है -
पटल विरूपण Diastrophic Force) बल तथा आकस्मिक अन्तर्जात बल। (अ) आकस्मिक बल जैसे भूकम्प एवं ज्वालामुखी, द्वारा भूपटल पर अल्पकाल में ही अनेक प्रकार के भूध्थ्यों का जन्म हो जाता है।
पटल विरूपण को दीर्घकालीन शक्ति कहा जाता है जो दीर्घावधि तक विशाल क्षेत्र में प्रभावी रहती हैं। इन्हें हम महादवीप एवं पर्वत निर्माणकारी बल कहते हैं।

पटल विरूपण (Diastrophism)
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा शक्तिशाली होता है। यह बल धीमी गति से दीर्घावधि तक कार्य करता है। अत: इसका प्रभाव हजारों वर्षों बाद परिलक्षित होता है। धरातल के नीचे क्रियाशील यह बल विवर्तनिक शक्तियों (tectonic force) के नाम से जाना जाता है। पटल विरुपण बलों को क्षेत्रीय दृष्टिकोण से दो उपवर्गों में विभाजित कर सकते हैं-

महाद्वीपीय निर्माणकारी बल (Epeirogenetic force)
इस बल को महाद्वीपीय संचलन बल भी कहा जाता है। इससे महादवीपों का उर्ध्वाधर उत्थान तथा निम्नवत् पतन होता है। फलस्वरूप अन्यान्य स्थलरूपों का निर्माण होता है। इसके प्रभाव समुद्रतट पर विशेष रूप से दृष्टिगोचर होते हैं जहाँ तटवर्ती भूमि जलमग्न या उन्मग्न होती है। यह बल पृथ्वी की त्रिज्या की दिशा में कार्य करता है। अत: इसे त्रिज्याई बल भी कहते हैं। दिशा की दृष्टि से इसे दो उपवर्गों में विभाजित किया जाता है - ऊर्ध्वगामी बल (Upward Force) तथा अधोगामी बल (Downward force)

पर्वत निर्माणकारी शक्तियाँ (Orogenetic force)
यह भू-पटल पर क्षैतिज दिशा में कार्य करता है अत: इसे स्पर्श रेखीय बल (Tangential force) भी कहते हैं। यह बल दो रूपों में कार्य करता है। जब बल दो विपरीत दिशाओं में कार्य करता है तो उससे तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसे तनावमूलक बल कहते हैं। तनाव के कारण भू पटल पर अंश (Fault), दरार (Fracture) तथा चटकने (Cracks) पड़ जाती हैं। जब बल आमने-सामने कार्य करता है तो संपीडन होने लगता है। इसे सम्पीडनात्मक बल कहते हैं। इससे भूपटलीय चट्टानों में वलन तथा संवलन पड़ जाते हैं। भू पटल पर उच्चावच के निर्माण में पर्वत निर्माणकारी संचलन (शक्तियों) बहुत महत्वपूर्ण हैं।

वलन (Folds)
भूपटल जब अवसादी शैलों की रचना होती है तो प्रारम्भ में उसके स्तर समतल होते हैं किन्तु, पृथ्वी की सम्पीडन गति के कारण इन पर विपरीत दिशा में दबाव पड़ता है तो उनमें सिकुड़न पैदा होती है और वे मुड़ जाती हैं। शैल-स्तरों के इस प्रकार बहुत अधिक मुड़ जाने को ही वलन कहा जाता है।
सम्पीडन के कारण भू-पटल की शैलों में पड़ने वाले मोड़ कभी भी सरल रूप में नहीं पाए जाते। प्राय सम्पीड़न और तनाव की गति, दिशा और तीव्रता में बड़ा अन्तर होता है। फलस्वरूप भू-पटल के विभिन्न भागों में शैलों में पढ़ने वाले मोड़ भी विभिन्न आकार, विस्तार एवं झुकाव के देखे जाते हैं। वलन के प्रमुख प्रकार निम्न हैं 

सममित वलन (Symmetrical folds)
इस प्रकार के वलन में गुम्बदों का आकार सुडौल होता है पार्श्ववर्ती ढाल एवं उनकी भुजाएँ समान होती है।
असममित वलन (Asymmetrical folds)
जिस वलन में गुम्बदों के पार्श्ववर्ती ढाल विभिन्न स्वभाव वाले होते हैं उसे असममित वलन कहते हैं। इस वलन की एक भुजा मन्द ढ़ाल व साधारण झुकाव वाली तथा दूसरी भुजा तीव्र ढाल तथा कम दूरी वाली होती हैं।
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एकनत वलन (Monoclinal folds)
जिस वलन में एक ढाल समकोण तथा दूसरा ढाल मन्द होता है उसे एकनत वलन कहा जाता है।
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समनत वलन (Isoclinal folds)
इस वलन में पार्श्ववर्ती भुजाएँ ऊर्ध्वाधर रूप में समानान्तर होती है। समान सम्पीडनात्मक बल के द्वारा इनका निर्माण होता है। इनकी भुजाएँ एक दूसरे के इतनी निकट होती है कि इनके टूटने की सम्भावना बनी रहती है।
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परिवलित वलन (Recumbent folds)
क्षैतिजवत् समानान्तर भुजाओं वाले वलन को परिवलित वलन की संज्ञा दी जाती है।
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प्रति वलन (Overturned folds)
सम्पीडन शक्ति अत्यधिक होने पर वलन की एक भुजा दूसरी पर उलट कर चढ़ जाती है तो उसे प्रति वलन कहा जाता है।
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अवनमन वलन (Plunging folds)
जब वलन के अक्ष समानान्तर न होकर एक दूसरे के कोणिक होते हैं तब इन्हें अवनमन वलन कहा जाता है।

पंखाकार वलन (Fan-shaped folds)
सम्पीडन बार-बार होने से अपनलियों तथा अभिनतियों में लहर उत्पन्न हो जाती है। फलस्वरूप अनेक छोटी-छोटी अभिनतियाँ एवं अपनतियाँ उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार के वलन को पंखा वलन कहते हैं।

खुला वलन (Open folds)
जब किसी वलन की दो भुजाओं के बीच का कोण 90° से अधिक तथा 180° से कम होता है तो इसे खला वलन कहते हैं।
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बन्द वलन (Closed folds)
जब किसी वलन की दो भुजाओं के बीच का कोण 90° से कम होता है तब इसे बन्द वलन कहते हैं। इसमें सम्पीडन शक्ति अधिक तीव्र होती है जिससे चट्टाने काफी ऊँची उठ जाती है। दोनों भुजाएँ ऊर्ध्वाधर रूप में काफी पास आ जाती है।
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