भारतीय समाज की विशेषताएं | bhartiya samaj ki visheshta

भारतीय समाज की विशेषता

समाज के अन्तर्गत हम लोगों व उनको प्रभावित करने वाले समस्त तत्त्वों, गतिविधियों, रीतियों, नीतियों, कार्यप्रणालियों, अधिकारों, व्यवहारों, बंधनों व स्वतंत्राओं तथा उनसे सम्बन्धित विभिन्न संगठनों, समूहों, विभागों तथा संस्थाओं, कलात्मक, सांस्कृतिक व धार्मिक तथा राजनैतिक व्यवस्था, शासन प्रणाली का पारस्परिक व समन्वयात्मक अध्ययन करते है। इसी संदर्भ में समाज को 'सामाजिक सम्बन्धों का जाल (Trap of Social Relations)' की संज्ञा भी दी जाती है।
अतः यह कहा जा सकता है, कि मानव समाज का निर्माण लोगों, उनसे सम्बन्धित प्रमुख संगठनों, रीतियों, नीतियों तथा स्थान के संदर्भ में उसके कुछ प्रमुख उद्देश्यों तथा आवश्यकताओं के संदर्भ होता है। किन्तु जब हम मानव समाज की बात करते है, तो उसे स्थान तथा समय सापेक्ष ही बताते है। जैसे - आजादी के पूर्व का भारतीय समाज कहने से तात्पर्य 15 अगस्त, 1947 से पूर्व भारतीय समाज की स्थिति से है।
bhartiya samaj ki visheshta
ठीक इसी प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी समाज कहने से भी यह इसके स्थान तथा समय सापेक्ष होने पर ही, इसकी सही स्थिति को बतायेगा। समाज को स्थान के आधार पर ग्रामीण समाज, शहरी समाज, राष्ट्रीय समाज तथा विदेशी समाज के रूप में बांटा जा सकता है।
एक ही समाज के अन्दर महिला समाज, बाल समाज, पुरुष समाज, के रूप में विभाजित किया जा सकता है। जो समाज के छोटे तथा बड़े दोनों स्वरूपों को बताता है अर्थात् समाज बड़ा व छोटा दोनों हो सकता है। किन्तु स्थान व समय सापेक्ष होने के साथ-साथ प्रत्येक समाज की अपनी कुछ प्रमुख विशेषताएं होती है। जिसमें वहाँ के लोगों द्वारा एक खास प्रकार का रहन-सहन, खान-पान, सम्बन्धों का दायरा, सांस्कृतिक व्यवहार, भाषा, बोली, साहित्यिक धार्मिक चेतना व इसी प्रकार की अन्य विशेषताएं मिलती है। अतः कहा जा सकता है कि, भारतीय समाज की भी अपनी कुछ मौलिक विशेषताएं है।
यदि हम भारतीय समाज व संस्कृति पर दृष्टिपात करते है तो पाते है कि, यह एक अतिप्राचीन व गौरवपूर्ण समाज रहा है जो आज वैश्वीकरण के दौर में आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए भी अपने प्राचीन सामाजिक व सांस्कृतिक विशेषताओं को संजोयें रखने का निरन्तर प्रयास कर रहा है। यद्यपि वर्तमान में इस पर पश्चिममी समाज व संस्कृति के प्रभाव में आने का आरोप भी लगता रहा है। चूँकि समाज एक अमूर्त अवधारणा है। अतः भारतीय समाज कि मौलिक विशेषता- उदारता, सहिष्णुता, प्राचीनता, स्थायित्व, समन्वयिता, आध्यात्मिकता, धार्मिक प्रधानता, अध्यात्मवाद, अनुकूलनशीलता, सामंजस्यता, वर्णाश्रम, कर्म व पुनर्जन्म, सर्वांगिणता तथा विविधता में एकता, विचारों तथा आदर्शों की प्रधानता, ग्रहणशीलता, गत्यात्मकता आदि आज भी आन्तरिक रूप से एक अखण्ड तथा मौलिक स्वरूप में बना हुआ है। यद्यपि बाह्य स्वरूप में यह अनेक विविधताओं का पुंज है, जिसमें सामुदायिक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन देखने को मिलता है।
भारतीय समाज के अन्तर्गत आर्य, अनार्य, द्रविड़, शक, हुण, कुषाण, पारसी, पुर्तगाली, फ्रांसिसी, मंगोलों के साथ-साथ अन्य उन सभी जातियों, प्रजातियों को शामिल करते है, जो यहाँ कि संस्कृति के प्रभाव में आकर यहां रच-बस गये और राष्ट्रीय धारा का अंग हो गये। इसके साथ ही भारतीय समाज एवं संस्कृति ने विश्व की विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, दर्शनों, विचारों, भाषाओं आदि के प्रति व्यावहारिक, सहनशीलता पूर्ण तथा समन्वयात्मक दृष्टिकोण रखते हुए उन्हें अपने में समाहित कर लिया। परिणामतः भारतीय समाज में विभिन्न जातियों, प्रजातियों, उनकी भाषाओं, रीति-रिवाजों, धर्मों दर्शनों व परम्पराओं का एक मिश्रण देखने को मिलता है। जिससे भारतीय समाज एवं संस्कृति में विभिन्नताओं का बोलबाला होता गया। इसी आधार पर कुछ लोग भारतीय संस्कृति में एकता का नितान्त अभाव बताते है। किन्तु यह सत्य नहीं है। यद्यपि भारतीय समाज एवं संस्कृति में अनेक संस्कृतियों के तत्त्वों का मिश्रण पाया जाता है जिसे भारतीय समाज ने अपने में समाहित कर लिया। किन्तु इसने अपनी मौलिक विशेषताओं (सहिष्णुता, ग्रहणशीलता, गत्यात्मकता, ..........) का कभी परित्याग नहीं किया। जिससे विभिन्न सांस्कृतियों व सामाजों के तत्त्वों के सम्मिश्रण के बावजुद इसकी मूलभूत विशेषता अखण्ड रूप से विद्यमान है। यही कारण है कि भारतीय समाज में 'अनेकता में एकता' (Unity with in Diversity) इसकी प्रमुख मौलिक विशेषताओं में माना जाता है।
अपनी इन्हीं चिरस्थायी विशेषताओं के कारण भारतीय समाज एवं संस्कृति को मानव समाज की अमूल्य निधि कहा जा सकता। इसकी सांस्कृतिक विशेषताएं हजारों सालों के बाद भी आज अमर स्वरूप में बनी हुई है। जो भारतीय समाज को एक अमर्त्य (अमर) स्वरूप प्रदान करती है। भारत के सुदीर्घकालीन इतिहास में हमारे ऋषि, मुनियों, महापुरुषों, धर्म, दर्शन, तीर्थस्थान, प्राचीन कलाकृतियाँ, सामाजिक संस्थाओं तथा अन्य सामाजिक समावेशी देशी-विदेशी तत्त्वों ने भारतीय समाज एवं संस्कृति के विकास तथा इसे मौलिक, अनुठी तथा विश्व की अन्य संस्कृतियों एवं समाज-व्यवस्थाओं से भिन्न बनाने में योगदान दिया। अपनी समस्त आभा, प्रतिभा तथा मौलिक विशेषताओं के साथ भारतीय समाज चिरकाल से आज तक जीवन्त बनी हुई है।

अतः भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है-

भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं

प्राचीनता के साथ स्थायित्व
विश्व की प्रमुख प्राचीन संस्कृतियों तथा समाज-व्यवस्थाओं में से एक भारतीय समाज एवं संस्कृति को माना जाता है। यह विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों मिश्र, असीरिया, बेबीलोनियों, यूनान और रोम की तरह प्राचीन होते हुए भी आज तक अपनी प्रमुख मौलिक विशेषताओं (प्राचीनता, स्थायित्व, समन्यवादी, अध्यात्मवाद, धार्मिक प्रधानता, सहिष्णुता, विविधता में एकता ....) को बनाये व जीवंत रखे हुए है। यद्यपि ये विशेषताएं हजारों साल प्राचीन है। जबकि समय के साथ अन्य प्राचीन संस्कृतियाँ या तो नष्ट हो गयी या आज उनके अवशेष मात्र ही दिखायी पड़ते है। भारतीय कवि की निम्न प्रमुख पंक्तियां बताती है- “कुछ बात है, हममें भी कि मिटती नहीं हस्ती हमारी, रहा सदियों जमां दुश्मन हमारा"।
उपर्युक्त पंक्तियों के माध्यम से कवि भारतीय संस्कृति के प्राचीनता के साथ इसके स्थायित्व को ही बताता है। वह कहता है कि जहाँ विश्व में अनेक समाज व संस्कृतियाँ नष्ट हो गयी वहीं भारतीय समाज अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी आजतक अपने को जीवंत बनायें हुए है। आज भी भारत में धार्मिक प्रधानता मिलती है। हम वैदिक धर्म को मानते है, विवाह, उपनयन व संस्कार अन्य वैदिक रीति से किया जाता है। विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला भारत में (संगम, कुंभ प्रयाग में) ही लगता है। प्रकृति पूजा, सहिष्णुता, अहिंसा, अस्तेय, धर्म, कर्म, पुनर्जन्म तथा आध्यात्मवाद के साथ-साथ, गाँव-पंचायत, जाति-प्रथा, संयुक्त परिवार प्रणाली जैसे तत्त्व यहाँ बड़े-पैमाने पर पाये जाते है तथा लोगों को प्रेरित करते है। ये सभी तत्त्व प्राचीन समय से आजतक भारतीय जीवन पद्धति के मूल आधार बने हुए है। यद्यपि हम वर्तमान में बदलते वैश्वीकरण के दौर में कई संस्कृतियों का प्रभाव भारतीय संस्कृति पर देखते है, किन्तु भारतीय समाज व संस्कृति ने उन प्रभावों व रीति-रिवाजों को अपने अनुसार उसे आत्मसात कर लिया है, न कि उनके अनुसार स्वयं को बदल दिया है। यही कारण है कि हम तकनीकी स्तर पर तेजी से बदलती व्यवस्था के बावजूद सामाजिक स्तर पर एक सतत् व स्थायी प्रक्रिया को पाते हैं। सदियों से अनेक वैश्विक आक्रमणों व समस्याओं को झेलनें के बाद भी भारतीय समाज व संस्कृति के मौलिक तत्त्व (अतीत के) वर्तमान में भी जीवित पाते है। भारतीय संस्कृति एवं समाज व्यवस्था प्राचीनता के साथ स्थायित्व को बताती है। जो इसकी विरोधाभास को साधनें की इसकी प्रमुख मौलिक विशेषताओं में से एक है। अन्यथा प्राचीनता के साथ जीवित रहना सम्भव नहीं।

क्षेत्रीय या भौगोलिक विविधता
उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में अरूणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में राजस्थान तक अनेक भौगोलिक विविधतायें हैं। कश्मीर में बहुत ठंड है तो दक्षिण भारतीय क्षेत्र बहुत गर्म है। गंगा का मैदान है जो बहुत उपजाऊ है तथा इसी के किनारे कई प्रमुख राज्य, शहर, सभ्यता और उद्योग विकसित हुए। हिमालयी क्षेत्र में अनेक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल जैसे बद्रीनाथ, केदारनाथ तथा गंगा, यमुना, सरयू, ब्रह्मपुत्र आदि नदियों का उद्गम स्थल है। देश के पश्चिम में हिमालय से भी पुरानी अरावली पर्वतमाला है। कहीं रेगिस्तानी भूमि है तो वहीं दक्षिण में पूर्वी और पश्चिमी घाट, नीलगिरी की पहाड़ियाँ भी हैं।यह भौगोलिक विविधता भारत को प्राकृतिक रूप से मिला उपहार है।

आध्यात्मवाद
भारतीय समाज एवं संस्कृति में अधात्मवाद को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। जिसके अन्तर्गत शारीरिक सुख (भौतिक सुख) और भोग लिप्सा के स्थान पर समाज में त्याग, तपस्या, मानसिक तथा आध्यात्मिक आनन्द को वरीयता दिया गया है। समाज में आत्मा व ईश्वर' को महत्त्व दिया गया। भारतीय दर्शन में भी चार्वाक दर्शन (भौतिकवादी) दर्शन को तुच्छ दर्शन कहा गया। चार्चाक दर्शन की उत्पत्ति देवगुरु बृहस्पति द्वारा दानव जाति के विनाश के संदर्भ में किया गया था। भारतीय समाज में भोग और त्याग का समन्वय देखा जाता है। एक ओर भारतीय समाज में जहाँ राजा 'ययाती' की कथा अत्यधिक भोग को बताता है, तो वही दूसरी ओर 'दधिची' की कथा चरम त्याग को बताता है।
जहाँ प्राचीन भारतीय महाकाव्यों में रामायण 'आदर्श' की बात करता है, तो वहीं महाभारत 'यथार्थ' की बात करता है। एक ओर जहाँ यज्ञ व अन्य अनुष्ठान में 'पशुबलि' की बात थी तो वहीं दूसरी ओर ‘अहिंसा व प्रकृति प्रेम' भी देखने को मिलता है। अतः स्पष्ट है कि भारतीय समाज एवं संस्कृति में आध्यात्मवाद को प्रमुखता देते हुए भोग और त्याग के बीच समन्वय का प्रयास किया गया था। जो 'अति सर्वत्र वर्जते' शब्द से स्पष्ट है।

भाषायी विविधता
भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, प्राचीन काल से ही भारत में अनेक भाषाओं व बोलियों का प्रचलन रहा है। वर्तमान में भारत में 18 राष्ट्रीय भाषाएँ तथा 1,652 के लगभग बोलियाँ पाई जाती हैं। भारत में रहने वाले लोग इतनी भाषाएँ व बोलियाँ इसलिए बोलते हैं। क्योंकि, यह उपमहाद्वीप एक लम्बे समय से विविध प्रजातीय समूहों की मंजिल रहा है। भारत में बोली जाने वाली भाषाओं को मुख्य रूप से चार भाषा-परिवारों में बाँटा जा सकता है।
ऑस्ट्रिक परिवार-इसके अर्न्तगत मध्य भारत की जनजातीय-पट्टी की भाषाएँ आती हैं जैसे-संथाल, मुण्डा, हो आदि।
द्रावीड़ियन परिवार-तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, गोंडी, आदि।
साइनो-तिब्बतन परिवार- आमतौर पर उत्तर-पूर्वी भारत की जनजातियाँ।
इंडो-यूरोपियन परिवार-भारत में सबसे अधिक संख्या में बोली जाने वाली भाषाएँ व बोलियाँ इण्डो आर्य-भाषा परिवार की हैं। जहाँ एक ओर पंजाबी, सिंधी भाषाएँ व बोलियाँ बोली जाती हैं वहीं दूसरी ओर मराठी, कोंकणी, राजस्थानी, गुजराती, मारवाड़ी, हिन्दी,उर्दू, छीसगढ़ी, बंगाली, मैथिली, कुमाउंनी, गढ़वाली जैसी भाषाएँ व बोलियाँ बोली जाती हैं।
भारतीय संविधान की 8 वीं अनुसूची में केवल 18 भाषाएँ ही सूचीबद्ध हैं। यह भाषाएँ असमिया, उड़िया, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, संस्कृत, सिंधी, हिन्दी, नेपाली, कोंकणी और मणिपुरी हैं। इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 343(2) के रूप में हिन्दी के साथ अंग्रेजी भाषा को भी सरकारी काम-काज की भाषा माना गया। सभी भाषाओं में हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो 2001 की जनगणना के अनुसार सबसे ज्यादा लोग बोलते हैं अर्थात् 248 करोड़।

धर्म की प्रमुखता
प्राचीन समय से ही भारतीय समाज व संस्कृति धर्म प्रधान रही है। जिसे आज भी भारतीयों के जीवन के प्रत्येक पक्ष में देखा जा सकता है। यहाँ जन्म से लेकर मृत्यु तक धार्मिक संस्कारों व प्रक्रिया को देखा जा सकता है। यहाँ सूर्योदय से सूर्यास्त तक दैनिक जीवन की प्रत्येक गतिविधियाँ में धार्मिक प्रभाव को आज भी देखा जा सकता है। प्राचीनकाल में भारतीय जीवन प्रणाली को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जैसे पुरुषार्थों में बांटा गया था। जिसमें लोगों के जीवन का प्रमुख उद्देश्य मोक्ष को माना गया। जिसमें धर्म तथा आध्यात्मिकता की प्रधानता थी। भारतीयों में धार्मिक भावना संकुचित रूप में न होकर एक व्यापक रूप में 'मानवतावादी तथा कल्याणकारी रूप' में देखने को मिलता है। यहाँ कि धार्मिक विचारधारा प्रत्येक जीवन में ईश्वर का अंश मानता है। 'अहं ब्रह्माष्मी', की वैदिक शब्दावली इसी विचारधारा को बताती है। चूंकि धर्म प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश समाहित मानता है। अतः वह मानव के साथ-साथ जीवमात्र की भलाई पर जोर देता हैं। जिससे एक समन्वयात्मक तथा सहिष्णु भावना उत्पन्न होती है।

सहिष्णुता
सहिष्णुता भारतीय समाज एवं संस्कृति की प्रमुख मौलिक व महान विशेषताओं में से एक है। यही कारण है कि भारत में विभिन्न धर्मों, जातियों, सम्प्रदायों के प्रति उदारता, सहिष्णुता, प्रेमभाव तथा समन्वय देखने को मिलता है। भारतीय समाज ने अपनी इस मौलिक विशेषता के कारण ही विभिन्न विदेशी समाज व संस्कृति को अपने में आत्मसात कर उनकों फलने-फूलने तथा विकास का प्रर्याप्त अवसर प्रदान किया है। यही कारण है कि विश्व के प्रमुख धर्मों का विकास भारत में किसी भी अन्य देश की समाज व संस्कृतियों की तुलना में अधिक देखने को मिलता है। आज हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी सभी धर्मों के लोग भारत में अपनी-अपनी धार्मिक विशेषताओं को बनाये हुए रह रहे हैं।
भारत जैसे समाज में जहाँ इतने धर्म एक साथ फल-फूल रहे हैं अपवादों को छोड़कर कभी भी धार्मिक युद्ध व साम्प्रदायिक संघर्ष का उदाहरण नहीं मिलता है। सहिष्णुता के कारण यहाँ विभिन्न धर्म फल-फूल रहे है, तो वही दूसरी ओर विभिन्न शोध बताते है कि विभिन्न धर्मों व पंथों का होना किसी समाज की सहिष्णुता तथा स्थायित्व को बढ़ावा देते है। भारतीय संविधान में भी विभिन्न धर्मों के साथ समान व्यवहार की बात कहीं गयी है। यही कारण है कि यहाँ अल्पसंख्यक (Minority) तथा 'बहुसंख्यक (Majarity)' दोनों की संस्कृतियाँ समाज में समान रूप से पायी जाती है और उनके उपर दूसरी संस्कृति को थोपने का प्रयास नहीं किया जाता। अतः स्पष्ट है कि भारतीय समाज व संस्कृति न तो धर्मयुद्ध को बढ़ावा देता है, और न तो एक ही धर्म के विभिन्न वर्गों के बीच वैमनस्य पैदा करता है। जो इसके सहिष्णु होने के कारण ही सम्भव हो सका है।

प्रजातीय विविधता
प्रजाति ऐसे व्यक्ति का समूह है जिनमें त्वचा का रंग, नाक का आकार, बालों के रंग के प्रकार आदि कुछ स्थायी शारीरिक विशेषताएं मौजूद होती हैं। भारत को प्रजातियों का अजायबघर इसीलिए कहा गया है क्योंकि, यहाँ समय-समय पर अनेक बाहरी प्रजातियाँ किसी-न-किसी रूप में आती रहीं और उनका एक-दूसरे में मिश्रण होता रहा। भारतीय मानवशास्त्री सर्वेक्षण के अनुसार देश की प्रजातीय स्थिति को सही तरह से समझ पाना कठिन है। प्रजाति व्यक्तियों का ऐसा बड़ा समूह है जिसकी शारीरिक विशेषताओं में बहुत अधिक बदलाव न आकर यह आगे की पीढ़ियों में चलती रहती हैं। संसार में मुख्यतः 3 प्रजातियाँ काकेशायड, मंगोलॉयड, नीग्रॉयड पाई जाती हैं। सरल शब्दों में इन्हें हम ऐसे मानव-समूह के नाम से सम्बोधित करते हैं जिनके शरीर का रंग सफेद, पीला तथा काला हो। भारतीय समाज में शुरू से ही द्रविड़ तथा आर्य, प्रजातीय रूप से एक-दूसरे से अलग थे। द्रविड़ों में नीग्रॉयड तथा आर्यों में कॉकेशायड प्रजाति की विशेषताएं अधिक मिलती थीं। बाद में शक, हूण, कुषाण व मंगोलां के आने पर मंगोलॉयड प्रजाति भी यहाँ बढ़ने लगी व धीरे-धीरे यह सभी आपस में इतना घुल-मिल गई कि, आज हमें भारत में सभी प्रमुख प्रजातियों के लोग मिल जाते हैं।

धार्मिक विविधता
भारत में अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। एक समय तक भारत में एक साथ विश्व के कई धर्म फले-फूले हैं जैसे- हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म, इसाई धर्म, पारसी धर्म, यहूदी धर्म। यहाँ हिन्द धर्म के अनेक रूपों तथा सम्प्रदायों के रूप में वैदिक धर्म, पौराणिक धर्म, सनातन धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, शाक्त धर्म, नानक पन्थी, आर्यसमाजी आदि अनेक मतों के मानने वाले अनुयायी मिलते हैं। इस्लाम धर्म में भी शिया और सुन्नी दो मुख्य सम्प्रदाय मिलते हैं। इसी प्रकार सिक्ख धर्म भी नामधारी और निरंकारी में, जैन धर्म दिगम्बर व श्वेतांबर में और बौद्ध धर्म हीनयान व महायान में विभक्त है। भारतीय समाज विभिन्न धर्मों तथा मत-मतान्तरों का संगम-स्थल रहा है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है ,जहाँ सभी को अपने-अपने धर्म का आचरण व पालन करने की छूट मिली है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में हिन्दू धर्म के अनुयायी सबसे ज्यादा अर्थात् 81.92 प्रतिशत, मुस्लिम धर्म के 12.29 प्रतिशत, इसाई धर्म के 2.16 प्रतिशत, सिक्ख धर्म 2.02 प्रतिशत, बौद्ध धर्म 0.79 प्रतिशत जैन धर्म के 0.40 प्रतिशत तथा अन्य 0.42 प्रतिशत हैं। इस प्रकार सभी धर्मों के लोगों की उपस्थिति को यहाँ देखकर यह कहा जा सकता है कि, देश की धार्मिक संरचना बहुधर्मी है।

जातिगत विविधता
‘प्यूपिल ऑफ इण्डिया' के अनुसार भारत में लगभग 4,635 समुदाय हैं। यह भारतीय संस्कृति की मौलिक विशेषता है, जो और कहीं नहीं पायी जाती। यह व्यक्ति को जन्म के आधार पर एक समूह का सदस्य मान लेता है, जिसके अन्तर्गत समूह अपने सदस्यों के खान-पान, विवाह और व्यवसाय, सामाजिक सम्बन्धों हेतु कुछ प्रतिबन्धों को लागू करता है। आज बाहरी प्रजातियाँ भी हमारी जातियों में ही समाहित हो गई हैं, यह इस व्यवस्था की व्यापकता को ही दर्शाता है। यद्यपि कई विचारकों जैसे के. एम. पणिक्कर और ईरावती कर्वे ने माना है कि जाति-व्यवस्था ने हिन्दू समाज को खण्ड-खण्ड में बाँट दिया है।

सांस्कृतिक विविधता
भारतीय संस्कृति में हम प्रथाओं, वेश-भूषा, रहन-सहन, परम्पराओं, कलाओं, व्यवहार के ढंग, नैतिक-मूल्यों, धर्म, जातियों आदि के रूप में भिन्नताओं को साफ तौर से देख सकते हैं। उत्तर-भारत की वेशभूषा, भाषा, रहन-सहन आदि अन्य प्रान्तों यथा दक्षिण, पूर्व व पश्चिम से भिन्न हैं। नगर और गांवों की संस्कृति अलग है, विभिन्न जातियों के व्यवहार के ढंग, विश्वास अलग हैं। हिन्दुओं में एक विवाह तो मुस्लिमों में बहुपत्नी-प्रथा का चलन है, देवी-देवता भी सबके अलग-अलग हैं। भारतीय मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 91 संस्कृति क्षेत्र हैं। गांवो में संयुक्त परिवार प्रथा तथा श्रमपूर्ण जीवन है तो शहरों में एकांकी परिवार है। अतः स्पष्ट है कि भारत सांस्कृतिक दृष्टि से अनेक विविधताएँ लिए हैं।

जनांकिकीय विविधता
सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 102 करोड़ से अधिक थी जो आज 121 करोड़ तक पहुँच चुकी है। देश के विभिन्न राज्यों में जनसंख्या में बहुत विविधता मिलती है। उत्तर प्रदेश में जनसंख्या का कुल 16.17 प्रतिशत हिस्सा है तो उत्तर-पूर्वी राज्यों सिक्किम, मिजोरम, अरूणांचल प्रदेश, गोवा, मणिपुर आदि में कुल जनसंख्या का एक प्रतिशत भाग रहता है। दिल्ली में औसतन 9,294 लोग एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में रहते हैं तो वहीं अरूणांचल प्रदेश में इतने में 13 लोग रहते हैं। साक्षरता की दृष्टि से भारत का अध्ययन करने पर चलता है कि,सबसे कम साक्षरता बिहार में 47 प्रतिशत तथा सबसे अधिक लोग 99.1 प्रतिशत केरल मे साक्षर हैं। देश में 6.78 करोड़
के लगभग विभिन्न जनजातियों के लोग रहते हैं जिनकी जीवन शैली बिल्कुल अलग है। कुल __ जनसंख्या में अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों की जनसंख्या 47 प्रतिशत है।

समन्वय
भारतीय समाज के उदार, सहिष्णु होने के कारण यहां विभिन्न संस्कृतियों, पंथों व वर्गो के बीच समन्वय को देखा जाता है। अपनी समन्वय रूपी विशेषता के कारण ही भारतीय समाज ने विभिन्न संस्कृतियों के प्रमुख तत्वों को अपने में समाहित कर लिया और अपनी मौलिक विशेषता को बनाये रखा। भारतीय समाज में समन्वय के कारण ही जनजातिय, हिन्दू, मुस्लिम, शक, हूण, सिथियन, ईसाई आदि सभी संस्कृतियो के तत्त्व समाहित रूप में मिलते है। समन्वय के कुछ प्रमुख उदाहरण है भारत का अध्ययात्मवाद, योग-साधना और रहस्यवाद का का मुस्लिम संस्करण मुसलमानों का सूफी सम्प्रदाय है, मुस्लिम पीरों का मकबरें बनाकर पूजा करना, आगे चलकर बुद्ध को राम व कृष्ण की भाँति अवतार मानना तथा बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म का ही अंग मानना, सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रन्थ में कबीर, नानक के साथ-साथ रामचरित मानस व अन्य ग्रन्थों के दाहों को शामिल करना, अकबर द्वारा ईलाही धर्म की स्थापना, कबीर द्वारा हिन्दु-मुस्लिम समन्वय की बात करना। बोधिवृक्ष बौद्धों के साथ-साथ हिन्दु धर्म का भी पवित्र वृक्ष होना। बौद्ध, चैत्यों का हिन्दु मंदिरों में परिवर्तित हो जाना, पवन, शक, हुण और कुषाण का भारतीय समाज का अंग बन जाना। सहिष्णुता समन्वय तथा उदारता का तत्त्व ही है जो भारतीय संस्कृति को आज भी अस्तित्ववान बनायें हुए निरन्तर गतिमान कर रही है।

अनुकूलनशीलता
भारतीय संस्कृति को जीवन्त बनाये रखने में इसकी अनुकूलनशीलता के तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसी के कारण विभिन्न संस्कृतियों के तत्त्वों को अपने अनुकूल बनाकर भारतीय संस्कृति ने इसे आत्मसात कर लिया।
अनुकूलनशीलता का ही प्रभाव है, कि विभिन्न समाजों तथा संस्कृतियों के सम्पर्क में आने के बाद भी भारतीय सामाजिक व्यवस्था में टूटन, विघटन और पतन के तत्त्व अत्यन्त कम मात्रा में देखने को मिलता है। भारतीय समाज (परिवार, जाति, धर्म ......) समय के अनुसार अपने को परिवर्तित तथा अनुकल बनाती रही है। जिससे इसकी निरन्तरता आज के वैश्वीकरण के दौर में भी बनी हुई है।

सर्वांगीणता
भारतीय समाज के प्रमुख विशेषताओं में सर्वांगीणता एक है। यह समाज के किसी एक वर्ग, व्यक्ति, सम्प्रदाय को नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज के संदर्भ में किसी बात, उद्देश्य तथा तथ्यों को विश्लेषित करते हुए समाज के निर्माण में समाज के सभी पक्षों धनी, गरीब, राजा, मजदूर, किसान, उद्योगपति, शुद्र, ब्राह्मण, शिक्षित व अशिक्षित, देशी-विदेशी लोगों तथा विभिन्न धर्मों एवं महापुरुषों के समन्वित योगदान को बताता है और उनके सर्वांगीण विकास की बात करता है।

कर्म एवं पुनर्जन्म
भारतीय समाज एवं संस्कृति में कर्म को बहुत महत्त्व दिया गया है। यहाँ कर्म करते हुए 100 वर्षों तक जीने की बात कही गयी है। गीता में 'कर्त्तव्यों वाधिकारेंशतु .......... मॉफलेषु कदाचीन ... जैसी बात कही गयी है। यहाँ तो अच्छे कर्मों का अच्छा तथा बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है, ऐसी धारणा प्रचलित है। भारतीय समाज में 'आत्मा' को अजर-अमर माना गया है। जो व्यक्ति के मरने के बाद किस योनी को प्राप्त करेगा? इसका निर्धारण पिछले कर्मों के अनुसार होता है। श्रेष्ठ कर्म करने वाले उच्च योनी तथा बुरे कर्म करने वाले निम्न योनी को प्राप्त करते है। लोगों का सुख व दुख प्राप्त करना कर्मों का फल माना गया है। अतः कर्म और कर्म से प्रभावित पुर्नजन्म का सिद्धान्त भारतीयों को अच्छे कर्म की प्रेरणा देने के साथ ही कर्म की सार्वभौमिकता को भी सिद्ध करता है।

वर्णाश्रम
वर्णाश्रम भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता है। यहाँ समाज में वर्णाश्रम व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्व तथा शुद्र चार वर्णो का उल्लेख मिलता है, जिनकी रचना श्रम विभाजन हेतु की गयी थी। समाज में बुद्धि तथा शिक्षा के प्रतीक ब्राह्मण को, तो शक्ति का प्रतीक क्षत्रियों को, व्यापारिक व्यवस्था तथा भरण-पोषण का प्रतीक वैश्यों को तथा अन्य सभी वर्गों की सेवा करने वाले को शूद्रों का प्रतीक माना गया। उपर्युक्त सभी वर्गों के कर्त्तव्यों तथा अधिकारों का सुन्दर समन्वय भारतीय समाज में दिखायी देता है। यद्यपि इस व्यवस्था द्वारा सामाजिक अन्याय तथा शोषण भी देखने को मिलता हैं। जिसे वर्तमान में दूर करने का भरसक प्रयत्न किया जा रहा है।
इसके साथ-साथ भारत में 'आश्रम व्यवस्था' भी पायी जाती है, जिसमें मनुष्य की आयु के अनुसार भारतीय मनीषियों ने चार आश्रमों - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संयास की बात कही है। वर्ण और आश्रम व्यवस्था तथा जीवन दर्शन के अनुसार विभाजित व व्यवस्थित किया गया था। व्यक्ति का सामाजिक एवं व्यावहारिक जीवन बेहतर तरीके से चलता रहें। इसके लिए समाज में आश्रम व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य के चार पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की पूर्ति करना सुनिश्चित किया गया था।

विविधता में एकता
भारत में विभिन्न जाति, प्रजाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, विभिन्नताएं पायी जाती है। यहाँ पर विभिन्न समाजों तथा संस्कृतियों के तत्त्वों का मिश्रण देखने को मिलता है। फिर भी उपर्युक्त सभी विभिन्नताओं के बावजूद यहाँ सभी भारतीय में एकरसता, एकता एवं संगठन तथा समन्वय देखने को मिलता है। अनेक विभिन्नताओं के बाद भी कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक जीवन की एक विशेष एकरूपता देखने को मिलती है। जो भारतीय समाज में 'विविधता में एकता' के तथ्य को ही बताती है।
अतः स्पष्ट है कि भारतीय समाज अपनी उपर्युक्त मौलिक विशेषताओं के कारण ही आजतक अपने को जीवन्त बनाये हुए। जबकि इसकी समकालीन विश्व समाज या तो नष्ट हो गये या अवशेष के रूप में ही अपनी विशेषताओं को वर्णित करते है। भारतीय समाज में सर्वधर्म समभाव, 'वसुधैव कुटुम्बकम' तथा मानव कल्याण व सहिष्णुता, अनुकूलशीलता, समन्वयात्मकता और विविधता में एकता, धार्मिक तथा आध्यात्मिकता इसे सतत् गतिशील व प्रवाहमय बनाये रखेगें, जो इसकी अपनी मौलिक विशेषता ही है। जिससे भारत में विभिन्न धर्मों, जातियों, प्रजातियों का समन्वयकारी तथा सर्वांगीण विकास होगा।

संयुक्त परिवार व्यवस्था
वे परिवार जिनमें अनेक पीढ़ियों के रक्त संबंधी साथ-साथ रहते है, एक साथ भोजन ग्रहण करते है व सभी सदस्य द्वारा अर्जित आए आपस में सामन्य रूप से विभाजित करते है व सदस्यों की आवश्यकताओ को पूर्ण करते है उसे सयुंक्त परिवार या विस्तृत परिवार कहा जाता है। प्रारम्भ से ही संयुक्त परिवार व्यवस्था, भारतीय समाज की एक विशिष्ट विशेषता रही है लेकिन समय के साथ साथ ये व्यवस्था भी धूमिल होती जा रही है भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है और कृषि एक ऐसा व्यवसाय है जिसमे अधिक से अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता होती है इसी आवश्यकता के कारण भारतीय समाज में संयुक्त परिवार व्यवस्था विकसित हुई और आज भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता कही जा सकती है

जाति व्यवस्था
भारतीय समाज कठोर श्रेणीब्रदता मैं बधा है। समाज चाहे किसी भी श्रेणी, काल-खण्ड या युग का हो, उसके स्वरूप में असमानता एवम् विभेदीकरण का किसी-न-किसी रूप में पाया जाना एक अनिवार्यता है। सामाजिक विभेदीकरण के अन्तर्गत व्यक्तियों को अनेक वर्गों, भाषा, आयु, सगेसम्बन्धियों, नातेदारों, लिंग, धर्म, स्थान-विशेष इत्यादि का आधार लेकर अलग किया जाता है। समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो सामाजिक स्तरीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाज के प्रत्येक व्यक्ति और वर्ग का जन्म, शिक्षा, व्यवसाय और आय के आधार पर विभाजन किया जाता है।
जाति-व्यवस्था की स्थापना हमारी भारतीय समाज की आधारभूत विशेषता है। भारत में सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया का मूल आधार जहाँ जाति और वर्ग रहे हैं तो वहीं पश्चिमी देशों में केवल वर्ग। भारत में हिन्दू-समाज प्राचीन समय से ही जाति के आधार पर अनेक श्रेणियों में बँटा रहा है। जाति-व्यवस्था के आने के कारण हमारा समाज समस्तरीय और विषमस्तरीय रूप से अनेक भागों में बँटता चला गया। तुलनात्मक रूप से देखें तो जाति-व्यवस्था के अंतर्गत अनेक श्रेणियों में बँधे समूह वर्ग-व्यवस्था में श्रेणीबद्ध समूहों से कहीं अधिक संख्या में हैं। भारत की वर्तमान सामाजिक संरचना को देखें तो पता चलता है कि, वर्तमान में समाज न केवल जातीय आधार पर बल्कि वर्गीय आधार पर भी स्तरीकृत हो रहा है।

आध्यात्मिकता
भारतीय समाज की अन्य मुख्य विशेषता धर्म एवं नैतिकता की प्रधानता है धर्म व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पहलु को नियन्त्रित करता है विश्व के सभी प्रमुख धर्म विधमान है भारत में अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। एक समय तक भारत में एक साथ विश्व के कई धर्म फले-फूले हैं
जैसे- हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म, इसाई धर्म, पारसी धर्म, यहूदी धर्म। यहाँ हिन्दू धर्म के अनेक रूपों तथा सम्प्रदायों के रूप में वैदिक धर्म, पौराणिक धर्म, सनातन धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, शाक्त धर्म, नानक पन्थी, आर्यसमाजी आदि अनेक मतों के मानने वाले अनुयायी मिलते हैं। इस्लाम धर्म में भी शिया और सुन्नी दो मुख्य सम्प्रदाय मिलते हैं। इसी प्रकार सिक्ख धर्म भी नामधारी और निरंकारी में, जैन धर्म दिगम्बर व श्वेतांबर में और बौद्ध धर्म हीनयान व महायान में विभक्त है। भारतीय समाज विभिन्न धर्मों तथा मत-मतान्तरों का संगम-स्थल रहा है सभी जीवो के कल्याण एवं दया में विश्वास, परोपकार, सहानुभूति व सहनशीलता आदि विचारों की प्रधानता भारतीय समाज की एक अन्य विशेषता है भारतीय समाज की एक महत्यपूर्ण विशेषता है भारतीय समाज आध्यात्मिक विचारों में विश्वास रखता है जैसे की पुनर्जन्म , आत्मा, पाप, पुण्य,कर्म , धर्म
और मोक्ष भारतीय समाज पर धर्म का बहुत गहरा प्रभाव है चाहे कोई भी समुदाय जैसे हिंदू , मुस्लिम, सिख, किसी भी समुदाय को लिया जाये सभी की प्रमुख सामाजिक संस्थाएं धर्म द्वारा प्रभावित होती है।

साराशं

इस इकाई में हमने भारतीय समाज की विभिन्न विशेषताओं को स्पष्ट किया है। पहले यह बताया गया है कि भारत में पायी जाने वाली विविधताएं किन-किन रूपों में विद्यमान हैं, उसके बाद इन सभी विविधताओं के बीच भारतीय समाज में देखी जा सकने वाली एकता की भावना को इन्हीं आधारों पर समझाया गया है। भारत देश में प्राचीन समय से ही अनेक संस्कृतियों, भाषाओं, स्थानों और प्रजातियों के लोगों का आना-जाना बना रहा। कालान्तर में इनमें से कई जातियाँ, संस्कृतियाँ यहीं रच-बस गई और धीरे-धीरे यहाँ के वातावरण और संस्कृति में एकाकार होकर एक नई मिलीजुली संस्कृति का रूप ले लिया। आज भारत में जो लोग निवास कर रहे हैं, उनकी अलग-अलग बोलियाँ-भाषाएँ हैं, अलग धर्म-संस्कृति है, अलग नस्ल-प्रजातियाँ हैं और भिन्न मान्यताएं, रिवाज़, प्रथाऐं,, मत और विश्वास हैं। परन्तु इतनी भिन्नताओं के होने पर भी यह कहा जा सकता है कि, यह सभी एक भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं, एक ही माला के अलग-अलग फूल हैं जो एक ही धागे में पिरोये हुए हैं।भारत इतना विशाल देश है, जिसमे विभिन्न भिन्नता पाई जाती हैं। भारत अपनी विविधता में एकता , जाति व्यवस्था, संयुक्त परिवार व्यवस्था, धर्म व आध्यात्मिकता के लिए विश्व भर में जाना जाता हैं।
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