भारत में हरित क्रांति के जनक कौन है? | bharat mein harit kranti ke janak kaun hai

भारत में हरित क्रांति के जनक

भारत में हरित क्रांति के जनक एम.एस. स्वामीनाथन है।
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भारतीय कृषि में हरित क्रांति
भारतीय कृषि में फसल पैदावार और खाद्य उत्पादन में एक बड़ा सुधार सन् 1968 से 1988 के मध्य एक क्रांति के रूप में आया था। इसे भारतीय कृषि का स्वर्णिम युग या हरित क्रांति कहते हैं। हरित क्रांति के फलस्वरूप हम कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो गए हैं। हरित क्रांति का श्रेय हमारे देश के महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन को जाता है। भुखमरी के विरोध के लिए उन्हें विश्व खाद्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
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यह परिवर्तन हमारे वैज्ञानिकों तथा असंख्य किसानों के साझे प्रयासों के फलस्वरूप संभव हुआ। भारत में हरित क्रांति गेहूँ व धान की उन्नत खेती से आरम्भ हुई। हरित क्रांति के अन्तर्गत उच्च तकनीक एवं अधिक संसाधनों के प्रयोग से सीमित खेतों में अधिक अन्न उत्पादन किया गया। भारत में बढ़ती जनसंख्या की खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि उत्पादकता में बढ़ोत्तरी हुई है। इस दौरान कृषि का जो बेहतर विकास हुआ उसे स्थिर रखना एक मुख्य चुनौती थी।
समय के साथ-साथ खेतों से अधिक अन्न उत्पादन लेने के लिए रासायनिक उर्वरकों एवं कीट-फफूंद नाशकों का उपयोग होने लगा। दूसरी ओर प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने के साथ-साथ धरती की उत्पादक क्षमता कम होने लगी। आज कृषि के प्रति आत्मनिर्भरता तो बढ़ी है, परन्तु भूमि एवं मानव दोनों पर दुष्प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। हरित क्रांति को जारी रखने के लिए कार्बनिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

हरित क्रांति का परिचय

1960 के दशक के आरम्भिक चरण में कृषि में कुछ नए तकनीकों की शुरुआत की गई, जो विश्व भर में हरित क्रांति के नाम से प्रसिद्व हुई। इन तकनीकों का प्रयोग पहले गेहूँ की खेती के लिए तथा दूसरे दशक में धान की खेती के लिए किया गया। इन तकनीकों के द्वारा खाद्यान्न उत्पादन में क्रांति आई तथा उत्पादकता स्तर 250 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ गया।
हरित क्रांति के पीछे सबसे बड़ा हाथ जर्मन कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग का था, जो 1960 के दशक के शुरुआत में मैक्सिको में ब्रिटिश रॉकफेलर फॉउंडेशन स्कॉलरशिप पर अनुसंधान कर रहे थे। बोरलॉग द्वारा विकसित उन्नत किस्म के गेहूँ के बीजों के द्वारा उत्पादकता 200 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई।
1965 तक सपफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया गया तथा खाद्यान्न अभाव वाले देश, जैसे- मैक्सिको, ताइवान आदि में किसानों द्वारा इनका प्रयोग किया जाने लगा।

हरित क्रांति की पृष्ठभूमि

नियोजन के प्रारंभिक वर्षों में राज्य के स्वामित्व के अंर्तगत भारी औद्योगीकरण विकास नीति का मुख्य आधार और आधुनिकीकरण का प्रतीक था। हालांकि, खाद्य पदार्थों के लिए भारत ने रुपये के भुगतान के प्रति पब्लिक लों 480 (पीएल -480) के अंर्तगत संयुक्त राज्य अमेरिका से आपूर्ति पर भरोसा किया था क्योंकि भारत के पास अंतर्राष्ट्रीय बाजार से बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थों की खरीद करने के लिए प्राप्त विदेशी मुद्रा नहीं थी।
इस व्यवस्था की खमियां 1960 के दशक के मध्य में तब स्पष्ट हो गई जब अमेरिका ने (कुछ राजनीतिक मतभेदों के कारण) अस्थायी रूप से गेहूं की आपूर्ति ऐसे समय में रोक (निलंबित) दी जब भारत बार-बार पड़ने वाले सूखे का सामना कर रहा था और देश “जहाज से सीधे मुँह तक" वाली स्थिति में रह रहा था।
भारत ने अपनी पीएल-480 की गलती और कृषि की उपेक्षा से तुरंत सीख ली। भारत ने अनुभव किया कि यदि उसने मूलभूत खाद्य पदार्थों के उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त नहीं की तो उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है।
भारत ने 1966 में मैक्सिको से 18,000 टन गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्मों (एच.बाई.वी.) का आयात किया और इस प्रकार हरित क्रांति का शुभारंभ हुआ।

भारत में हरित क्रांति के कुछ महत्वपूर्ण घटक इस प्रकार हैं :-
  • बीजों की अधिक उपज देने वाली किस्में (एच.वाई.वी)।
  • सिंचाई (क) सतही और (ख) भूमिगत।
उर्वरकों (रासायनिक), कीटनाशकों और पीड़कनाशकों का प्रयोग।
  • कमान क्षेत्र विकास (सी.ए.डी)।
  • भूमि सुधार और जोतों का समेकन।
  • कृषि ऋण की आपूर्ति।
  • ग्रामीण विद्युतीकरण।
  • ग्रामीण सड़कें और विपणन।
  • कृषि का यंत्रीकरण।
  • कृषि विश्वविद्यालय।

हरित क्रांति का अर्थ

"हरित क्रान्ति का अर्थ कृषि की उत्पादन तकनीक को सुधारने एवं कृषि उत्पादन में वृद्धि करने से है। " इस प्रकार हरित क्रान्ति में मुख्य दो बातें आती है-
  1. उत्पादन तकनीक में सुधार
  2. कृषि उत्पादन में सुधार।

हरित क्रांति के तत्व
  • अधिक उत्पादन देने वाले बीजों का प्रयोग
  • रासायनिक खादों का अधिक उपयोग
  • सिंचाई का विस्तार
  • बहुफसली कार्यक्रम को न प्रोत्साहन
  • भूमि परीक्षण
  • यन्त्रीकरण को बढ़ावा
  • ग्रामीण विद्युतीयकरण
  • वैज्ञानिक ढंग से कषि को प्रोत्साहन

हरित क्रांति का प्रभाव
खाद्य उत्पादन में वृद्धि: 1967-68 से, गेहूं के उत्पादन में लगभग 15 गुना की वृद्धि हुई है।
चावल का उत्पादन पांच गुने से भी अधिक बढ़ चुका है।
भारत न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि कृषि उपजों का शुद्ध निर्यातक भी है। वर्ष 2014-15 में $20 बिलियन डॉलर से भी कम आयात के विरूद्ध भारत का कृषि निर्यात $38 बिलियन डॉलर का था। भारत विश्व में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।
किसानों की समृद्धि : यह स्थिति, विशेष रूप से 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि वाले बड़े किसानों के साथ है।
औद्योगिक विकास : हरित क्रांति के फलस्वरूप कृषि का बड़े पैमाने पर मशीनीकरण हुआ जिससे ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर, कम्बाइन, डीजल इंजन, विद्युत मोटर, पंप सेट आदि जैसी मशीनों के लिए मांग पैदा हुई। इसके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, पीड़कनाशकों, खरपतवार नाशाकों आदि की मांग में भी काफी वृद्धि हुई है। फलस्वरूप, इन वस्तुओं का उत्पादन करने वाले उद्योगों ने कई गुना प्रगति की है। इसके अतिरिक्त, कृषि आधारित उद्योगों में कई कृषि उत्पादों का कच्चे माल के रूप में उपयोग होता है।
ग्रामीण रोजगार : जहां एक ओर, खेती के मशीनीकरण से बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की आशंका जताई जा रही थी, वहीं कई फसलें लेने के चलते श्रम बल की मांग में सराहनीय वृद्धि हुई है।
किसानों के दृष्टिकोण में परिवर्तन : जिस प्रकार से किसानों ने तत्पपरता से हरित क्रांति की तकनीक को अपनाया उससे यह मिथक टूट गया कि भारतीय किसान परंपरा से बंधे हुए हैं और नई पद्धतियों और तकनीकों का उपयोग नहीं कर सकते हैं।

हरित क्रांति की कमियां :
आई.डी.ए.पी और एच.वाई.वी.पी के माध्यम से नवीन कृषि नीति का अंगीकरण निवेश की भारी राशि की अनिवार्यता के कारण बड़े किसानों के बीच ही सीमित होकर रह गया है।
नवीन कृषि नीति संस्थागत सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने में विफल रही है कृषि के मशीनीकरण में वृद्धि के साथ-साथ नवीन कृषि नीति से श्रम के विस्थापन की समस्या पैदा हो गई है।
हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन और आय के संदर्भ में अंतर-क्षेत्रीय असमानताओं को व्यापक बनाया है।
हरित क्रांति में कीटनाशकों के उपयोग से दुर्घटनाओं और तीव्र विषाक्तता के कारण अशक्तता से उत्पन्न होने वाले कुछ अवांछनीय सामाजिक परिणाम भी निहित हैं।
हरित क्रांति के वर्षों के बाद आज एक बार पुन: भारतीय कृषि विकास की नई चुनौतियों के साथ चौराहे पर खड़ी है। प्राकृतिक संसाधनों का रिक्तीकरण और क्षरण, जलस्तर में गिरावट, नदियों, झीलों में पानी के प्रवाह में कमी, जैविक और अजैविक दबाव, जलवायु परिवर्तन आदि हमारी प्रमुख चुनौतियां हैं। आज हमें ऐसी रणनीतियों का विकास करने की आवश्यकता है जिससे धारणीय उत्पादकता लाभ और साथ ही खेती की लाभप्रदता का मार्ग प्रशस्त हो।

दूसरी हरित क्रांति
इस हेतु हमें अवश्य प्रयास करना चाहिए और संवृद्धि बढ़ाने जैसी अल्पकालिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के धारणीय उपयोग, मृदा स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन जैसी दीर्घावधिक चिंताओं पर पर्याप्त ध्यान देते हुए विगत अनुभव से कुछ सबक अवश्य लेने चाहिए।
पर्यावरण अनुकूल साधनों का उपयोग करने के माध्यम से धारणीय कृषि का उपयोग।
स्थानीय भौगोलिक और जलवायविक स्थिति, मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता और प्रकृति, पानी, मानव संसाधन एवं अवसंरचना सुविधाओं की उपलब्धता व उत्पादन लागत को ध्यान में रखना।
जैव उर्वरकों तथा जैव कीटनाशकों का प्रयोग।
जैविक खेती में अनुसरण किए जाने वाले व्यवहार जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ जल संरक्षण सम्मिलित है- 'प्रति बूंद अधिक फसल'।
इसमें आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों का उपयोग भी सम्मिलित है।
सूचना प्रौद्योगिकी, नैनो प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, परिशुद्ध कृषि, जैवगतिशील खेती जैसी नई प्रौद्योगिकियों का गुलदस्ता।
दालों और तिलहन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और बागवानी और पुष्प कृषि उत्पादन दोगुना करने के साथ-साथ फसलों का भारी विविधीकरण करना और कई फसलें लेना।
भारत में यह अवधारणा और कार्यक्रम दोनों रूपों में विद्यमान है।
वर्ष 2004 में सरकार ने “दूसरी हरित क्रांति" की घोषणा की।
सरकार ने दूसरी हरित क्रांति को आगे बढ़ाने के क्रम में समयसमय पर कई अन्य कार्यक्रमों का भी शुभारंभ किया है, जैसे वर्ष 2010-11 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की उप-योजना के रूप में “पूर्वी भारत में हरित क्रांति लाना" (बी.जी.आर.ई. आई) कार्यक्रम।
पूर्वी भारत के सात राज्यों (असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश) में कृषि उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से (बी.जी.आर.ई.आई) कार्यक्रम।
हाल ही में, प्रधानमंत्री ने भारत में दूसरी हरित क्रांति लाने के विषय में चर्चा की है।
केवल गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का जैसे पांच खाद्यान्नों पर केंद्रित हरित क्रांति के विपरीत, दूसरी हरित क्रांति अपने दायरे में संपूर्ण कृषि क्षेत्र को लेती है। इसलिए, इसे इंद्रधनुष क्रांति भी कहा जाता है।
अपनी संभावनाओं के कारण भारत की पहली हरित क्रांति के वास्तु शिल्पी एम.एस. स्वामीनाथन द्वारा दिए गए लोकप्रिय नाम सदाबहार हरित क्रांति के रूप में भी इसे जाना जाता है।

हरित क्रांति का प्रभाव
  • आर्थिक प्रभाव
  • सामाजिक प्रभाव

आर्थिक प्रभाव
  • रोजगार में वृद्धि
  • कृषि उत्पादकता में वृद्धि
  • विदेशी मुद्रा की बचत
  • औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार
  • कृषि बचतों में वृद्वि
  • आर्थिक विकास का आधार
  • कृषि उत्पादन में वृद्धि
  • किसानों की संवृद्धि

सामाजिक प्रभाव
  • विचारधारा में परिवर्तन
  • भूमि सुधार पर प्रभाव
  • ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार में वृद्धि
  • ग्रामीण जनसंख्या का शहरों में पलायन
  • क्षेत्रीय असमानताओं में वृद्धि
  • उपभोक्ताओं पर प्रभाव

शब्दावली
  • हरित क्रांन्ति- हरित क्रान्ति का अर्थ कृषि की उत्पादन तकनीक को सुधारने एवं कृषि उत्पादन में वृद्धि करने से है।
  • पलायन – एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की क्रिया पलायन कहलाती है । जैसे - जब कोई व्यक्ति गाँव से शहर में बस जाता है तो इस क्रिया को पलायन कहते है।
  • उत्पादन- उद्योगों द्वारा किसी वस्तु तथा सेवा का निर्माण करना। जिससे मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है उसे उत्पाद कहते है।
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