अनुवाद की प्रक्रिया | anuvad ki prakriya

अनुवाद की प्रक्रिया

अनुवाद प्रक्रिया में स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा का उचित ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। अच्छे अनुवादक के लिए इन दोनों का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। साहित्यानुवाद में अनुवादक से अपेक्षाएं और अधिक बढ़ जाती हैं। साहित्यानुवाद में अनुवादक को स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा के साथ-साथ दोनों भाषाओं की संस्कृति का ज्ञान होना भी अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के लिए यदि किसी जर्मन पाठ का हिंदी में अनुवाद करना है तो अनुवादक के लिए इन दो भाषाओं के ज्ञान के अलावा जिस चीज की आवश्यकता है वह है इन दोनों की संस्कृतियों का ज्ञान। और यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यह ज्ञान फौरी या सतही किस्म का न हो अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो जाने की संभावना होती है।
anuvad ki prakriya
अनुवाद प्रक्रिया पर विभिन्न अनुवाद चिंतकों ने चर्चा की है। यूजीन नायडा अनुवाद के मूलतः तीन चरणों की बात करते हैं। ये तीन चरण हैं - पाठ विश्लेषण, अंतरण और पुनर्गठन।
न्यूमार्क के अनुसार अनुवाद प्रक्रिया के तीन चरण हैं - बोधन, अभिव्यक्तिकरण और पाठ निर्माण।
न्यूमार्क द्वारा बताए गए अनुवाद प्रक्रिया के ये तीन चरण नायडा द्वारा बताए गए तीन चरणों से मिलते-जुलते ही हैं।
अनुवाद की संज्ञानात्मक प्रक्रिया (cognitive process) में व्याख्यात्मक प्रारूप (interpretive model) के प्रवर्तक डेनिका सेलेस्कोविच तथा मरियाने लेडरर संगोष्ठी निर्वचन के संदर्भ में अनुवाद प्रक्रिया के तीन महत्वपूर्ण चरण बताते हैं - पठन तथा बोधन, डिवर्बलाइजेशन अथवा मौखिकीकरण और पुनःप्रस्तुतीकरण।
जीन डेलिसेल अनुवादक द्वारा अनूदित पाठ को पुनः पढ़ने तथा उसके मूल्यांकन के संदर्भ में एक अन्य चरण की भी चर्चा करते हैं जिसे वे वेरिफिकेशन अथवा प्रमाणीकरण कहते हैं। (संदर्भ : Munday, Jeremy (2001) Introducing Translation Studies : Theories and applications,Routlege, London and Newyork)
डॉ भोलानाथ तिवारी ने अपनी पुस्तक अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि में अनुवाद प्रक्रिया के पांच चरणों की चर्चा की है। उनके अनुसार पाठ विश्लेषण, अंतरण और पुनर्गठन के बाद अनूदित पाठ का समायोजन और मूल पाठ से तुलना भी आवश्यक है। तभी अनुवाद की प्रक्रिया संपूर्ण हो पाती है। उनके अनुसार अनुवाद प्रक्रिया के ये पांच चरण हैं - पाठ-पठन, पाठ-विश्लेषण, भाषांतरण, समायोजन एवं मूल से तुलना। अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों पर चर्चा करते हुए हमने यह अनुभव किया कि विभिन्न अनुवाद चिंतकों द्वारा बताए गए अनुवाद प्रक्रिया के चरणों में काफी हद तक समानता है। इसी क्रम में जिसकी चर्चा जीन डेलिसेल करते हैं, अनुवाद प्रक्रिया के बाहर भी कुछ महत्वपूर्ण चरणों की चर्चा की जाती है जैसे - पुनरीक्षण, मूल्यांकन तथा समीक्षा। अनुवाद प्रक्रिया के इन बाह्य चरणों में से पुनरीक्षण की विस्तृत चर्चा इस इकाई में भी की जाएगी।
समायोजित रूप से कहें तो अनुवाद प्रक्रिया के ये चरण निम्न प्रकार हैं :-
  • पाठ अध्ययन
  • पाठ विश्लेषण
  • भाषांतरण
  • प्रतिस्थापन
  • तुलनात्मक विश्लेषण पाठ

अध्ययन : अनुवाद करते समय इन सभी चरणों पर अनुवादक को विचार करना होता है। सर्वप्रथम मूल पाठ को समग्रता से पढ़ा जाता है। इस समग्रता के भीतर अनुवादक मूल पाठ की वस्तु, उसकी प्रकृति, उद्देश्य आदि को समझने का प्रयत्न करते हैं। यहां यह ध्यान दिया जाना आवश्यक है कि सर्जनात्मक साहित्य की भाषा गैर सर्जनात्मक भाषा से पूर्णतः भिन्न और गहन अर्थ सम्पन्न होती है। तात्पर्य यह कि यहां विचार के साथ भावों का भी सामंजस्य होता है। इसलिए अनुवादक के लिए बहुत गंभीरता से इसका अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है। यह भी संभव है कि अर्थ के जितने स्तर मूल रचनाकार ने दिए हों उतना जतन करने पर भी अनुवादक उन अर्थ स्तरों तक न पहुँच पाए। और संभव यह भी है कि वह लेखक से भी बेहतर अर्थच्छायाओं को ढूंढ निकाले। ऐसी स्थिति में कई बार अनुवाद मूल से भी बेहतर बन पड़ता है। किंतु ऐसा करते समय अनुवादक को अपनी सीमाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। पूरे ध्यान से पढ़ने के बाद अनुवादक पाठ का विश्लेषण करते हैं।

पाठ विश्लेषण : पाठ विश्लेषण के चरण में अनुवादक अनुवाद की प्रक्रिया को तय करते हैं। यह पूरी प्रक्रिया आंतरिक होती है जिसमें अनुवादक एक मनःस्थिति तक पहुँच जाते हैं। इसी चरण के अंतर्गत अनुवादक को यह भी तय करना होता है कि अनुवाद की भाषा क्या हो। अर्थात अनुवादक के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि वे किसके लिए अनुवाद कर रहे हैं। यानी उस अनुवादक का ग्राहक कौन है। और स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो यह कि यदि अनुवादक शेक्सपीयर का अनुवाद कर रहे हैं या फिर कालिदास की किसी रचना का अनुवाद कर रहे हैं तो उसकी भाषा क्या होगी। क्या वह वैसी ही शास्त्रसम्मत भाषा होगी या फिर उसे समयानुसार बदलना होगा। पाठक की आयु, उसकी क्षमता, उसकी आवश्यकता आदि सभी बिन्दुओं पर यहीं विचार किया जाना आवश्यक है। इसी के अंतर्गत पाठानुवाद के उददेश्य की भी चर्चा होगी। कई बार अनुवाद करने का उद्देश्य केवल वस्तु तक सीमित होता है। और कई बार यह और विस्तृत होकर उसके शिल्प, उसकी भाषा के प्रति भी उतना ही गंभीर होता है। यहीं अनुवादक को यह भी तय करना होता है कि अनूद्य कृति की विधा के प्रति उसका क्या दृष्टिकोण है। उसके अनुसार ही उन्हें अनुवाद की नीति तय करनी होती है।

भाषांतरण : तीसरा चरण भाषांतरण है जिसमें अनुवादक मूल भाषा के कथ्य को लक्ष्य भाषा में अंतरित करते हैं। यह विश्लेषण के ठीक बाद का चरण है जिसके तहत अनुवादक तय रणनीति के अनुसार पाठ का भाषांतरण करते हैं। इस प्रक्रिया के तहत सही भाषा का चयन, सही वाक्य संरचना, भाषा का अपना मुहावरा, कथ्य के साथ न्याय आदि विभिन्न बिन्दुओं का ध्यान रखा जाता है। यह वास्तव में एक जटिल चरण है जिसमें अनुवादक भाषा, प्रतीकों, संवेदनाओं, अर्थच्छायाओं आदि के सही प्रयोग की समस्या से जूझते रहते हैं।
डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार यह अंतरण मुख्यतः तीन प्रकार का हो सकता है -
  • (क) किसी इकाई का समान इकाई में, जिसे शब्द-शब्द, पदबंध-पदबंध, उपवाक्य-उपवाक्य, वाक्य-वाक्य, वाक्यबंध-वाक्यबंध अंतरण कह सकते हैं।
  • (ख) बड़ी इकाई छोटी इकाई (जैसे उपवाक्य-पदबंध)
  • (ग) छोटी इकाई-बड़ी इकाई (जैसे पदबंध उपवाक्य)।

प्रतिस्थापन : इस प्रक्रिया का अगला चरण है प्रतिस्थापन। यह भाषांतरण के बाद और कहें तो लगभग साथ की ही प्रक्रिया है जिसके तहत अनुवादक स्रोत भाषा की वाक्य संरचना, पदबंध, प्रवाह, अर्थच्छाया, शब्द संगति आदि को लक्ष्य भाषा के पाठ में रखकर तो देखते हैं ही, साथ ही दोनों भाषाओं की संस्कृतियों के साथ न्याय हो पाया है या नहीं, यह भी देखना यहां आवश्यक हो जाता है। दरअसल सर्जनात्मक साहित्य और गैर सर्जनात्मक साहित्य के बीच यही मूलभूत बिन्दु है जहां आकर दोनों के अनुवाद की प्रक्रिया में अंतर आ जाता है। जहां गैर सर्जनात्मक साहित्य विचार के सम्प्रेषण के साथ ही सम्पन्न हो जाता है वहीं सर्जनात्मक साहित्य इस बिन्दु पर केवल एक आयाम तक ही पहुँच पाता है। इसके बाद के चरण में अनुवादक को दोनों संस्कृतियों के बीच के तालमेल का भी खासा ध्यान रखना पड़ता है। अनुवाद पढ़ते समय उसमें मूल की सी गति हो इसके लिए आवश्यक है कि वह लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुकूल हो। उसमें मूल पाठ में कही गई बात पूरी तरह से आ सके।

तुलनात्मक विश्लेषण पाठ : तुलनात्मक विश्लेषण या कि मूल्यांकन साहित्य के अनुवाद का अंतिम तथा सबसे कठिन चरण है जिसके तहत दोनों पाठों को आमने-सामने रखकर न केवल भाषिक और पाठगत आधार पर तुलना करते हैं अपितु इस तुलना का एक अन्य महत्वपूर्ण आधार होता है सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भो का मिलान। मूल्यांकनकर्ता पाठ के प्रकाशन से पूर्व तथा उपरांत मूलपाठ तथा अनूदित पाठ का मिलान कर अपनी टिप्पणी देते हैं जिसकी सहायता से अनुवाद को यथासंभव सुधारा जा सकता है। तुलनात्मक विश्लेषण में मूल्यांकनकर्ता विभिन्न आधारों पर मूल्यांकन करते हैं जिसके अंतर्गत मल्यांकन का आधार कभी मुलपाठ होता है, तो कभी लक्ष्य समाज यह मूल्यांकन भाषा से लेकर संदर्भ सभी आधारों पर किया जाता है। इसमें उत्तम अनुवाद से तुलना भी एवं आधार है।

अनुवाद प्रक्रिया : विभिन्न प्रारूप

अनुवाद प्रक्रिया पर जिन विदेशी विद्वानों ने गंभीरतापूर्वक विचार किया है इनमें नाइडा और न्यूमार्क के विचार अधिक चर्चित है। यहाँ संक्षेप में इन दोनों विद्वानों द्वारा प्रस्तावित प्रारूप पर प्रकाश डालना उचित होगा।

नाइडा द्वारा प्रस्तावित प्रारूप
नाइडा अनुवाद को एक वैज्ञानिक तकनीक के रूप में स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार अनुवाद भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयुक्त पक्ष है, अतः अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों को समझने और उसके विश्लेषण के लिए भाषावैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग आवश्यक है।
उनके अनुसार अनुवाद प्रक्रिया के तीन सोपान है -
  1. विश्लेषण
  2. अंतरण
  3. पुनर्गठन
एक कुशल और अनुभवी अनुवादक इन तीन भिन्न-भिन्न सोपानों को एक छलांग में पार कर लेता है। पर अनुवाद के प्रशिक्षार्थी को इन तीनों सोपानों से क्रमश: गुजरना पड़ता है। इन सोपानों को नाइडा ने आरेख द्वारा इस प्रकार व्यक्त किया है-
इन तीनों सोपानों में एक निश्चित क्रम है। स्रोत भाषा में पहले से ही रचित मूलपाठ के संदेश को ग्रहण करने के लिए अनुवादक सबसे पहले पाठ का विश्लेषण करता है। पाठ भाषाबद्ध होता है और संदेश भाषिक संरचना के माध्यम से संप्रेषित किया जाता है, इसलिए नाइडा के अनुसार मूलपाठ के विश्लेषण के लिए भाषासिद्धांत तथा उसमें अपनाई जाने वाली विश्लेषण तकनीक का उपयोग आवश्यक हो जाता है। नाइटा का यह भी गत है कि हर भाषिक संरचना के दो स्तर होते हैं- अभ्यांतर तथा बाह्य । आभ्यांतर स्तर का संबंध भाषा के सार्वभौम पक्ष से जुड़ा होता है। अत: इस स्तर पर स्थित संदेश स्रोतभाषा और लक्ष्य भाषा के लिए समान-रूप होता है। इसके विपिरीत बाह्य स्तर की संरचना का संबंध भाषाविशेष की विशिष्ट व्याकरणिक व्यवस्था के साथ रहता है, जिसके फलस्वरूप गहरे स्तर पर स्थित समान संदेश को अभिव्यक्त करने के लिए दो भाषाएँ (स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा) दो भिन्न-भिन्न अभिव्यक्ति-प्रणालियों का प्रयोग करती है। नाइडा के अनुसार अनुवाद गहन स्तर पर स्थिति समानधर्मी संदेश के फलस्वरूप ही संभव हो पाता है। अतः अनुवादक के लिए आवश्यक है कि वह बाह्य स्तर पर स्थित भाषिक संरचना का विश्लेषण करते हुए उसके गहन स्तर पर स्थित संदेश का पता लगाएँ और उस धरातल पर पाठ का अर्थबोध करें।
उदाहरण के लिए अंग्रेजी का एक वाक्य लें- Mohan frightens Sheela. गहरे स्तर पर इसकी दो व्याकरणिक संरचनाएँ संभव है। एक में मोहन, कर्ता के रूप में सक्रिय प्राणी (एजेन्ट) के रूप में कार्य करता है और दूसरे में वह करण के रूप में मात्र क्रिया के साधन के रूप में प्रयुक्त होगा। इसी के अनुसार क्रिया के दो अर्थ भी संभव हो पाते हैं।
हिंदी में इसके दो समानार्थी संदेश संभव हैं- 1. मोहन शीला को डराता है और 2. शीला मोहन से डरती है। विश्लेषण के उपरांत प्राप्त इन दोनों संदेशों के बाही अनुवादक पाठ के संदर्भ के अनुसार उनमें से किसी एक या दोनों संदेशों को अनूदित पाठ में संप्रेषित करने का निर्णय लेता है।
विश्लेषण से प्राप्त अर्थबोध का लक्ष्यभाषा में अंतरण अनुवाद प्रक्रिया का दूसरा सोपान है। प्रत्येक भाषा मूल संदेश को अपने ढंग से भाषिक इकाइयों में बाँधती है। अत: संदेश को एक भाषा से दूसरी भाषा में अंतरित करने का मतलब ही है अभिव्यक्ति के धरातल पर उसका पुनर्विन्यास करना। नाइडा के अनुसार पुनर्विन्यास की यह प्रक्रिया कुछ-कुछ उसी प्रकार की है जिस प्रकार कुछ विभिन्न आकार के बक्सों के सामान को उससे भिन्न आकार के दूसरे बक्सों में दुबारा सुव्यवस्थित ढंग से सजाया गया। पुनर्विन्यास की यह प्रक्रिया कभी मात्र ध्वनि/लिपि स्तर तक सीमित होती है जैसे अंग्रेजी के शब्दों "एकेडमी', "टेकनीक", "इंटरिम", "कॉमेडी" क्रमश: अकादमी, तकनीक, अंतरिम और कामदी के रूप में, और कभी नवीन अभिव्यक्ति के रूप में भाषा के सभी स्तरों पर। हिंदी की लोकोक्ति "नाच न आवे आँगन टेढ़ा" के अंग्रेजी अनुवाद A bad carpenter quarrels with his tools. में न तो नाच का प्रसंग है और न ही आँगन और उसके टेढ़े होने का। पर संदेश के धरातल पर ये दोनों अभिव्यक्तियाँ सममूल्य है।
पुनर्गठन अनुवाद प्रक्रिया का तीसरा सोपान है। ध्यान देने की बात है कि प्रत्येक भाषा की अपनी अभिव्यक्ति-प्रणाली और कथन-रीति होती है। लक्ष्यभाषा में अनूदित पाठ का निर्माण अगर मूलरचना के संदेश को यथारूप रखने के प्रयास से जुड़ा होता है, तो उसके साथ लक्ष्यभाषा की उस अभिव्यक्ति संस्कार के साथ ही संबद्ध रहता है, जो अनूदित पाठ को सहज, स्वाभाविक और बोधगम्य बनाता है। अनूदित पाठ के रचयिता के रूप में अनुवादक कई प्रकार की छूट ले सकता है, यथा पद्य में लिखी मूलकृति का यह गद्यानुवाद कर सकता है पर मूलकृति की काव्यात्मकता का बिना ह्रास किए हुए मूल रचना के सातआठ वाक्यों के संदेश को चार-पाँच वाक्यों अथवा दस ग्यारह वाक्यों में बाँध या फैला सकता है पर मूल संदेश में बिना कुछ जोड़े या घटाए, व्याकरणिक संरचना में भी वह परिवर्तन ला सकता है, यथा कर्मवाच्य में व्यक्त मूल अभिव्यक्ति को अनूदित पाठ में वह कर्तृवाच्य में बदल सकता है। (बशर्ते यह बदलाव लक्ष्य भाषा की प्रकृति की माँग का परिणाम हो।)
बाइबिल का अनुवादक होने के कारण नाश्डा की दृष्टि मूलतः एक विशिष्ट प्रकार के पाठ के अनुवाद तक सीमित थी। उनके अनुवाद संबंधी उदाहरण की प्राचीन पाठ, उसमें निहित गूढ़ाई की पकड़, विकसित तथा अविकसित भाषाओं में संदेश के संप्रेषण की समस्या आदि से जुड़े थे।

न्यूमार्क द्वारा प्रस्तावित प्रारूप
अनुवाद-प्रक्रिया पर न्यूमार्क द्वारा प्रस्तावित प्रारूप नाइडा के समान कुछ चरणों की अपेक्षा रखता है, पर अपने चिंतन में वह अधिक व्यापक है। इसे निम्नलिखित आरेख से दिखाया जाना संभव है।
न्यूमार्क और नाइडा द्वारा प्रस्तावित आरेख की तुलना से स्पष्ट होता है कि अनुवाद प्रक्रिया संबंधी संकल्पना में अगर उनमें समानता है, तो एक सीमा तक विभिन्नता भी है। न्यूमार्क अनुवाद प्रक्रिया की दो दिशाएँ स्वीकार करते हैं और इसीलिए मूलपाठ और अनूदित पाठ के सह संबंध को दो स्तरों पर स्थापित करते हैं। पहला संबंध दो पाठों के अंतरक्रमिक अनुवाद पर आधारित है, जिसे उन्होंने खंडित रेखा के माध्यम से जोड़ा है। अंतरक्रमिक अनुवाद, शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद होता है। अत: कई संदर्भो में न केवल अपनी प्रकृति में अपारदर्शी होता है, बल्कि भ्रामक भी होता है। खंडित रेखा से जोड़ने का मतलब ही है कि यह अनुवाद की सही प्रक्रिया नहीं है, भले ही कुछ अनुवादक इस रास्ते को अपनाने की ओर प्रवृत्त हों और कुछ को यह मार्ग सहज और सीधा लगे।
अनुवाद का दूसरा रास्ता मूलपाठ के अर्थबोधन और लक्ष्यभाषा में उच्च अर्थ के अभिव्यक्तिकरण का है न्यूमार्क द्वारा संकेतित बोधन की प्रक्रिया, नाइडा द्वारा प्रस्तावित विश्लेषण की प्रक्रिया से अधिक व्यापक संकल्पना है, क्योंकि इसमें विश्लेषण से प्राप्त अर्थ के साथ-साथ अनुवादक द्वारा मूलपाट की व्याख्या का अंश भी सम्मिलित है। कई भाषिक पाठ या उक्तियाँ अनुवादक की व्याख्या की अपेक्षा रखती है, अन्यथा अर्थ पारदर्शी नहीं बन पाता।
हम कुछ उदाहरणों द्वारा इस प्रारूप को यहाँ स्पष्ट करना चाहेंगे। किसी ट्रक पर अंकित “पब्लिक" के लिए "लोक/ जन" और "केरियर" के लिए "वाहन" मानते हुए अनुवाद लोकवाहन/जनवाहन संभव है। पर यह अनुवाद पारदर्शी अनुवाद नहीं माना जा सकता और न ही पूर्णरूप से बोधगम्य ।बोधन के धरातल पर "पब्लिक कैरियर" का एक अर्थ यह भी है कि उक्त वाहन किसी की निजी संपत्ति इस रूप में नहीं है कि सामान्य व्यक्ति इसका उपयोग कर सके। इसका जनसाधारण के लिए उपयोग संभव है बशर्ते कि व्यक्ति इसका उचित भाड़ा दे। अत: अर्थ के एक धरातल पर इसका अन्वय संभव है : A carrier which can be hired by public. अतः पारदर्शी अनुवाद के रूप में उसका अनुवाद "भाड़े का ट्रक" भी संभव है।
बोधन, व्याख्या सापेक्ष होता है और यह व्याख्या स्रोतभाषा में अन्वय के रूप में संभव है। उदाहरण के लिए, अंग्रेजी का एक वाक्य लें : Judgement has been reserved. अंतरकगिक अनुवाद के रूप में हिंदी में कहा जा राकता है : निर्णय आरक्षित/सुरक्षित कर लिया गया है। यह अनुवाद के रूप में न केवल अपारदर्शी है बल्कि अर्थ-संप्रेषण में भ्रामक भी है। "निर्णय का आरक्षण/सुरक्षा" अपने आशय को स्पष्ट नहीं कर पाता। अत: यह अर्थ बोधन के धरातल पर स्रोतभाषा में ही अन्वय की अपेक्षा रखता है : यथा Judgement wilnot be announced immediately/Judgement will be announced later. आदि।
बोधन के बाद का चरण है लक्ष्यभाषा में संदेश के अभिव्यक्तिकरण का, जो पुनर्गठन और पुनःसर्जना की भी अपेक्षा रखता है। ध्यान देने की बात है कि प्रत्येक भाषा की अपनी बनावट और बुनावट होती है, उसकी अपनी शैली और संस्कार होता है, अपना मिजाज और तेवर होता है। लक्ष्य भाषा में अनूदित पाठ के अभिव्यक्तीकरण के चरण में संदेश को यथासंभव सुरक्षित रखते हुए एक भाषा के रचनाविधान और संस्कार से दूसरी भाषा के रचना संस्कार और शैली संस्कार की यात्रा करनी होती है। अंग्रेजी के वाक्य : I have two books का अनुवाद होगा मेरे पास दो पुस्तकें है, पर I have two daughters का अनुवाद “मेरे पास दो लड़कियाँ है" गलत माना जाएगा। हिंदी के भाषा-व्यवहार के अनुरूप अनुवाद होगा : “मेरे दो लड़कियाँ है।" यह भाषा संस्कार ही है जिसके अनुसार Aline in reply will be appreciated का अनुवाद उत्तर में "लिखी एक पंक्ति प्रशंसित की जाएगी" उत्तर गलत माना जाएगा जबकि "उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी"। अनुवाद सही माना जाएगा। इसी प्रकार I wonder if this is true का अनुवाद “मुझे इस सच्चाई में संदेह है" अधिक उपयुक्त माना जाएगा। इस चरण पर Judgement has been reserved का हिंदी में अभिव्यक्तिकरण होगा : “निर्णय अभी नहीं सुनाया जाएगा।"
अनुवाद प्रक्रिया के अंतिम चरण का संबंध पाठ निर्माण से है। इस चरण पर अनुवादक न केवल लक्ष्य भाषा के अनुरूप संदेश को भाषिक अभिव्यक्ति का जामा पहनाता है, बल्कि मूलभाषा के पाठ की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सहपाठ का निर्माण करता है। उदाहरण के लिए अंग्रेजी का No admission या No smoking का बोधन के धरातल पर अन्वय होगा Admission is not allowed या Smoking is not allowed और अभिव्यक्तिकरण के चरण पर हिंदी में कथन होगा“अंदर आना मना है, सिगरेट बीड़ी पीना मना है"। पर यह संभव है कि पाठ-निर्माण के चौथे चरण में हम अनुवाद करें "प्रवेश निषिद्ध"। इसी प्रकार Judgement has been reserved का अभिव्यक्तिकरण के चरण पर हिंदी रूपांतरण “निर्णय अभी नहीं सुनाया जाएगा।" स्वीकार हो सकता है। पर पाठ-निर्माण के चरण पर इसका अनुवाद "निर्णय बाद में सुनाया जाएगा" अधिक सार्थक माना जाएगा।
अनुवाद प्रक्रिया के इन विभिन्न चरणों पर पाई जानेवाली अंग्रेजी-हिंदी की दो अभिव्यक्तियों के उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं :

स्रोत (मूल) भाषा पाठ
  • No smoking
  • Judgement has been reserved.

अंतरक्रमिक अनुवाद
  • नहीं धुआँ करना/धूम्रपान
  • निर्णय रख लिया गया सुरक्षित

बोधन
  • Smoking isnot allowed here.
  • Judgement will not be announced immediately,

अभिव्यक्तीकरण
  • बीड़ी-सिगरेट पीना मना है।
  • निर्णय अभी नहीं सुनाया जाएगा।

पाठ-निर्माण
  • धूम्रपान निषेध
  • निर्णय बाद में सुनाया जाएगा।

भूमिका समस्या प्रारूप
श्रीवास्तव और गोस्वामी के अनुवाद की प्रक्रिया का एक ओर प्रारूप प्रस्तुत किया है। उन्होंने एक तरफ अनुवाद को प्रतीक सिद्धांत के साथ जोड़कर देखने का प्रयत्न किया है और दूसरी तरफ अनुवाद प्रक्रिया को दो भाषाओं के बीच संप्रेषण व्यापार के संदर्भ में देखने की कोशिश की है। उनके अनुसार संदेश (कथ्य) का प्रतीकांतरण अनुवाद है।
पाठ को भाषिक प्रतीक के रूप में देखा जाना संभव है। प्रत्येक प्रतीक अपने संकेतन व्यापार में संकेतक (वाचक, अभिव्यक्ति) और संकेतित (वाच्य, कथ्य) की समन्वित इकाई होती है । अनुवादक का कार्य प्रतीकांतरण के समय संकेतित के मर्म (संदेश) को यथासंभव अक्षुण्ण बनाए रखना होता है । यह तभी संभव है जब दो पाठों (मूल और अनूदित) की अभिव्यक्ति पद्धति (संकेतक) और कथ्य व्याख्या (संकेतार्थ) को सममूल्य और समतुल्य बनाए रखे। इस तथ्य को निम्नलिखित आरेख द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
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यहाँ ध्यान देने की बात है कि संदेश, संकेतित कथ्य का मर्म होता है जो भाषिक प्रतीक के संदर्भ में अभिव्यक्ति और कथ्य के समन्वयन से बँधकर सामने उभरता तो अवश्य है, पर उसके दायरे में बँधा नहीं होता। उदाहरण के लिए "मंदिर में जल चढ़ाने" की उक्ति और उसकी दूसरी भाषा में प्रतीकांतरण की समस्या को ही लें। प्रेमचंद की कहानी "कफन" में प्रयुक्त हिंदी की यह उक्ति अंग्रेजी की चार भाषांतरित अभिव्यक्तियों में उपलब्ध है :
  • (क) To offer obligations
  • (ख) Tooffer Incense Water.
  • (ग) Tooffer holy Water, और
  • (घ) Tooffer Prayers.
अनुवाद (क) और (घ) में पानी का उल्लेख नहीं है और (ख) और (ग) में पानी का उल्लेख तो है, पर उसे विशिष्ट जल के रूप में अनूदित किया गया है इसका कारण स्पष्ट है। मंदिर में जल चढ़ाने) के संदेश के मर्म (संकेतन) को संबंध पूजा से है जो चारों अंग्रेजी अनुवादों के भूल में है और जो मूल और अनूदित पाठ को सममूल्य बनाता है।
अनुवाद प्रक्रिया का संबंध दो भाषाओं के बीच के संप्रेषण, व्यापार से है। इस संप्रेषण व्यापार में अनुवादक को तीन निश्चित भूमिकाओं का निर्वाह करना पड़ता है। साथ ही भाषांतर अर्थव्यापार से संबद्ध रहता है। अत: अनुवादक को अर्थव्याख्या की तीन प्रक्रियाओं और उसके समरूपों से जूझना पड़ता है। अनुवाद प्रक्रिया के भूमिका समस्या प्रारूप के अनुसार उसके तीन प्रसंग सामने आते हैं :

अनुवादक की भूमिका
  • (मूलपाठ का) पाठक
  • द्विभाषिक
  • (अनूदित पाठ का) रचयिता

प्रक्रिया
  • बोधन
  • अंतरण
  • सर्जन

समस्या
  • अर्थग्रहण की समस्या
  • अर्थांतरण की समस्या
  • अर्थ-संप्रेषण की समस्या

अर्थग्रहण की समस्या
पाठक की भूमिका के रूप में अनुवादक को मूलपाठ के अर्थग्रहण की समस्या का समाधान दो स्तरों पर करना पड़ता है। पहले स्तर का संबंध स्रोत भाषा की अपनी बनावट और बुनावट से है और दूसरे स्तर का पाठ के विषय तत्त्व से। भाषा स्तर से संबंधित कई उदाहरण पहले भी दिए जा चुके हैं। यहाँ इतना कहना पर्याप्त होगा कि मूलपाठ का संदेश भाषिक अभिव्यक्तियों के उस जाल के भीतर छिपा होता है जो कभी संकेतार्थ का सहारा लेता है और कभी संरचनार्थ, प्रयोगार्थ अथवा संपृक्तार्थ का।
अत: 'संदेश' को पकड़ने के लिए अभ्यांतर आवश्यक हो जाता है, यथा-
  • (किसी की) आँख लगना - निद्रा
  • (किसी से) आँख लगना - प्यार होना
  • (किसी पर) आँख लगना - लालसा
भाषा सामाजिक संस्कार का बोध भी करती है। अत: कुछ अभिव्यक्तियाँ अपने बोधन के लिए उस संस्कार को भी अर्थग्रहण के दायरे में ले जाती है। इसकी उपेक्षा करने से संदेश का मर्म ठीक से पकड़ में नहीं आ पाता और अनुवाद भ्रामक हो जाता है। उदाहरण के लिए "कफन" में "गंगा नहाना" का प्रसंग है, जिसके चार अनुवाद उपलब्ध हैं।
  • (क) togo to the Ganges
  • (ख) to bathe in the Ganges to wash away the sins.
  • (ग) to swim in the Ganges to wash away the sins
  • (घ) to wash their sins in the Ganges
स्पष्ट है (क) अनुवाद में "पाप धोने" का भाव व्यक्त नहीं होता और (ग) में नहाने के भाव को "तैरने" के भाव से अतिरंजित कर दिया गया है।
जहाँ तक विषय-वस्तु से संबंधित बोधन और अर्थग्रहण की समस्या का सवाल है, अनुवादक से यह अपेक्षा की जाती है कि पाठ-संबंधी विषय की उसे एक सीमा तक जानकारी हो। उसे पाठ संबंधी विषय का विशेषज्ञ नहीं माना जाता, पर एक सामान्य पाठक के रूप में कथ्य को समझने की क्षमता हमेशा अपेक्षित रहती है, अन्यथा अनुवाद सटीक नहीं बन पाता। उदाहरण के लिए अंग्रेजी का एक शब्द लें reaction इसके तीन विभिन्न विषय क्षेत्रों में अर्थ के आधार पर तीन अनुवाद संभव हैं। क्योंकि वे अलग-अलग प्रक्रियाओं से जुड़े हैं। यथा प्रतिक्रिया (भौतिकी), अभिक्रिया (रसायन शास्त्र) और अनुक्रिया (मनोविज्ञान)।
पाठक के रूप में अनुवादक को यह हमेशा याद रखने की आवश्यकता होती है कि शब्दार्थ, पाठ-सापेक्ष होता है। विषय और प्रसंग के अनुसार शब्दों के अर्थ बदल जाया करते हैं उदाहरण के लिए, अंग्रेजी के शब्द treatment को ही लें। तीन विभिन्न प्रसंगों में इसके तीन अर्थ संभव हैं:
  1. Treatment of cancer कैंसर का इलाज
  2. Treatment of the subject matter विषय वस्तु का प्रतिपादन
  3. Treatment of servant नौकर के साथ व्यवहार

अर्थांतरण की समस्या
द्विभाषिक की भूमिका में अर्थांतरण की समस्या का समाधान अनुवादक को कई स्तरों पर करना पड़ता है। कभी वह मूल भाषा की शाब्दिक इकाई को आगत शब्द के रूप में अपनाता है, कभी उसका भाषांतरित पर्याय ढूँढ़ता है, और कभी उसकी व्याख्या करते हुए अन्वय प्रस्तुत करता है। उदाहरण के लिए "कफन" कहानी में आए "चमार" शब्द को हम चार अनूदित रूपों में पाते हैं।
  1. Chamar
  2. Cobbler
  3. Tanner
  4. Untouchable leather worker
इसी तरह "रायता" शब्द के चार अनूदित रूप देखने को मिलते हैं :
  • rayta
  • curd
  • curd with spices
  • vegetable salads spiced and pickled in curd.

पूर्ण पुनर्विन्यास
अर्थांतरण के लिए इसमें संपूर्ण अभिव्यक्ति को ही बदलना पड़ता है। अत: संदेश को छोड़कर मूलपाठ और अनूदित पाठ में कोई समान-तत्व नहीं दिखाई पड़ता। उदाहरण के लिए अंग्रेजी के मुहावरे by tooth and nail का हिंदी अनुवाद होगा "जी जान से"।

विश्लेषणात्मक पुनर्विन्यास
इस प्रकार के अंतरण में मूल अभिव्यक्ति की किसी एक इकाई के द्वारा अर्थ को अनूदित पाठ में कई भाषिक इकाई द्वारा प्रेषित किया जात है, यथा “देवरानी" शब्द का अंग्रेजी अनुवाद होगा wife of younger brother of husband.

संश्लेषणात्मक पुनर्विन्यास
इस प्रकार के अंतरण में मूलभाषा के एक व्याकरणिक प्रकार्य को व्यंजित करने के लिए अनूदित भाषा में किसी अन्य अभिव्यक्ति पद्धति का सहारा लिया जाता है । अंग्रेजी के उपपद 'a' और 'the' के अंतरण के लिए हिंदी में विभिन्न शब्द क्रम का प्रयोग, यथा:
  1. There is a snake in the room..
  2. There is the snake in the room.

का हिंदी में क्रमश: अनुवाद होगा 
  • कमरे में साँप है।
  • साँप कमरे में है।

अंतरण की समस्या
अंतरण करते समय दो सिद्धांतों का निर्वाह आवश्यक होता है पहले का संबंध मूलपाठ के अर्थ के सममूल्य अर्थ से है जिसका अनुवादक पाठ में "न घटा कर, न बढ़ा कर" (no loss, no gain) सिद्धांत के आधार पर प्रस्तुत करता है। दूसरा सिद्धांत समतुल्यता का है जिसके आधार पर अनुवादक अनूदित पाठ को शैली और अभिव्यक्ति के धरातल पर मूलपाठ के समतुल्य भाषिक उपादान के माध्यम से निर्मित करता है।
अनूदित पाठ के रचयिता के रूप में अनुवादक को अर्थ-संप्रेषण की समस्या का सामना करना पड़ता है। अनुवादक पाठ का मूल रचयिता नहीं है, उसके सामने "प्रारूप" के रूप में पहले से ही एक पाठ "मूल पाठ" होता है जिसके समानांतर अनूदित भाषा में एक "सहपाठ" का उसे निर्माण करना पड़ता है । मूलपाठ के संदेश और फिर उसकी अभिव्यक्ति से संबंधित शैलीगत गठन के दबाव के साथ उसको अनूदित पाठ का निर्माण करना पड़ता है। दूसरी तरफ वह अपने पाठ का रचयिता होने के कारण अपने पाठक वर्ग की भी उपेक्षा नहीं कर सकता। अत: उसे अपने देश और काल के अनुरूप अनूदित पाठ को बोधगम्य और संप्रेष्य भी बनाना पड़ता है। यही कारण है कि "चैत का महीना" का अनुवाद वह कभी month of April और कभी end of spring season के रूप में करता है।
सममूल्य संदेश को बोधगम्य रूप से संप्रेषित करने के लिए अनूदित भाषा की प्रकृति का ज्ञान अनुवादक के लिए आवश्यक होता है। यह भाषा कीअपनी शैलीगत विशिष्टता का ही परिणाम है कि अंग्रेजी भाषा के कर्मवाच्य में अभिव्यक्त संदेश को हिंदी में कर्तृवाच्य के रूप में संप्रेषित किया जाता है। यथा

"Signed by Xin the presence ofY and Z.” का हिंदी अनुवाद होगा
"ख और ग की उपस्थिति में क ने हस्ताक्षर किए।"
इसी प्रकार “The meeting was chaired by Secretary.” का अनुवाद होगा
"बैठक की अध्यक्षता सचिव ने की।" ।

ऊपर के विवेचन से स्पष्ट है कि अनुवाद प्रक्रिया का संदर्भ अनुवादक को किसी प्रकार मूल कृति के अर्थ ग्रहण की समस्या (बोधन) स्रोत भाषा में व्यक्त संदेश के लक्ष्य भाषा में अर्थांतरण की समस्या (अंतरण) और अनूदित पाठ के रूप में अर्थ-संप्रेषण की समस्या (सर्जन) के प्रति सजग और उसके उचित समाधान के लिए सक्षम बनाता है।

अनुवाद प्रक्रिया का महत्व

अनुवाद कार्य स्वयं में एक जटिल तथा श्रमसाध्य क्रिया है। अनुवाद करते समय अनुवादक को परकाया प्रवेश करना होता है। किसी पाठ को पाठक की तरह पढ़ना तथा अनुवादक की तरह पढ़ना में बहुत अंतर है। पाठ पढ़ते हुए आप उसका सतत आनंद ले सकते हैं लेकिन अनुवाद करते समय प्रत्येक पंक्ति पर रुकना, प्रत्येक शब्द के लिए सही पर्याय खोजना, प्रत्येक अभिव्यक्ति को उचित तरीके से पुनःप्रस्तुत करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य हैं।
अनुवाद प्रक्रिया को बेहद सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। आप सभी फिल्म, धारावाहिक आदि देखते होंगे। किसी फिल्म या धारावाहिक को देखते हुए क्या आपने कभी उसकी निर्माण प्रक्रिया पर विचार किया है? आपके सामने प्रस्तुत दृश्य के निर्माण में फिल्म निर्देशक से लेकर पूरी टीम को कितना श्रम करना पड़ा होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है क्योंकि आपके सामने प्रस्तुत दृश्य को उन्होंने समूचे दृश्य के रूप में नहीं देखा होगा। दृश्य निर्माण के समय वे उसके विभिन्न तकनीकी दृष्टिकोणों पर विचार कर रहे होंगे। उनके इन प्रयासों के माध्यम से ही एक खूबसूरत फिल्म, धारावाहिक, गीत आदि आपके सामने प्रस्तुत होते हैं। ठीक इसी तरह अनुवादक को भी किसी पाठ के अनुवाद में इतनी ही तकनीकी समस्याओं से उलझना पड़ता है। तब कहीं जाकर एक मुकम्मल पाठ हमारे सामने आ पाता है। अनुवाद की यह पूरी प्रक्रिया अनुवादक के इसी कठिन परिश्रम की ओर संकेत करती है। किसी पाठ को पूरी तरह समझे बिना तथा उसे आत्मसात् किए बिना अनुवाद कार्य संभव नहीं है। अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों से गुजरकर ही अनुवादक पाठकों के समक्ष एक अनूदित पाठ प्रस्तुत कर पाते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो अनुवाद प्रक्रिया की तुलना खूबसूरत कपड़े से की जा सकती है जिसकी बुनाई के अनेक सोपानों से गुजरकर वह हमारे सामने आ पाता है। इस पूरी निर्माण प्रक्रिया में लगाया गया श्रम तथा बुद्धि दोनों का ही उसके निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है।

अनुवाद प्रक्रिया के सभी महत्वपूर्ण चरणों

पाठ अध्ययन, पाठ विश्लेषण, भाषांतरण, प्रतिस्थापन तथा तुलनात्मक विश्लेषण, इन सभी का अनुवाद में विशेष महत्व है। इन सभी चरणों से गुजरकर कोई पाठ अंतिम रूप प्राप्त कर पाता है। इसलिए हमारे समक्ष उपलब्ध अनूदित पाठ की संरचना की दृष्टि से अनुवाद प्रक्रिया के ये चरण विशेष महत्व रखते हैं क्योंकि इसी जटिल प्रक्रिया से गुजरते हुए और अपनी अदम्य मेहनत, लगन तथा समर्पण से ही अनुवादक हमें अज्ञात की ऐसी दुनिया में ले जाते हैं जो इससे पूर्व हमारे लिए अदेखी और अनजान थी। विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के सर्जनात्मक तथा ज्ञानात्मक साहित्य की यह संपदा हम तक पहुँच पाती है और हम व्यापक समाज से जुड़कर न केवल समृद्ध होते हैं अपितु विश्वनागरिक बनने की ओर अग्रसर होते हैं।

सारांश

अनुवाद प्रक्रिया संबंधी प्रस्तुत इकाई में आपने पढ़ा है कि अनुवाद को समझने की दो दृष्टियाँ हैं । इनमें से एक अनूदित पाठ को आधार बनाती है और दूसरी अनुवाद में निहित प्रक्रिया को। आपको पता चला है कि वास्तव में दूसरी दृष्टि ही अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक है क्योंकि अनुवाद कर्म का विश्लेषण करने के साथ ही यह अनुवाद सीख रहे लोगों को उनकी विभिन्न भूमिकाओं के प्रति सजग और समर्थ बनाने में सहायक होती है। अनुवाद व्यापार के विभिन्न सोपानों के अध्ययन के दौरान आपने विभिन्न विद्वानों द्वारा दिए गए प्रारूपों को देखा। नाइडा, न्यूमार्क तथा श्रीवास्तव गोस्वामी द्वारा दिए गए प्रारूपों में मूल पाठ का विश्लेषण और संदेश स्रोत भाषा में ग्रहण तथा लक्ष्य भाषा में पुनर्प्रस्तुति को विभिन्न कोणों से समझाया गया है। यह समग्र विश्लेषण अनुवादक की जिन तीन भूमिकाओं को आधार बनाकर चलता है, वे हैं

पाठक.................... द्विभाषिक विश्लेषक......................लेखक या सर्जक।

आपने यह भी पढ़ा है कि इन तीन भूमिकाओं के निर्वाह में उसे क्रमश: तीन प्रकार की समस्याओं का समाधान करना पड़ता है-
  1. अर्थ ग्रहण की समस्या,
  2. अर्थातरण की समस्या, और
  3. अर्थ संप्रेषण की समस्या।

शब्दावली
  1. संश्लिष्ट - जटिल
  2. सममूल्य - समानांतर
  3. सम्प्रेष्य - जिसका सम्प्रेषण हो सके।
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