यकृत के कार्य | yakrit ke karya

यकृत क्या है ?

शरीर के निरोगी रहने के लिए सभी अंगों का स्वस्थ होना जरूरी होता है। उत्तम स्वास्थ्य और बेहतर जीवनचर्या के लिए सभी अंगों की अहम् भूमिका होती है। इनमें से मस्तिष्क और हृदय शरीर में माता-पिता के समान भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं। इनके बाद हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग लिवर यानि कि यकृत की बारी आती है। यह हमारे सीने में दाहिनी ओर डायफ्राम के नीचे और आमाशय के ऊपर स्थित होता है। पत्ती के आकार वाले लालिमा लिए भूरे रंग के इस अंग में चार पिंड होते हैं। आमतौर पर यकृत का वजन लगभग 1.5 किग्रा होता है और चौड़ाई 15 सेमी। मस्तिष्क के बाद यह हमारे शरीर का सबसे बड़ा अंग है जो पाचन तंत्र में अहम भूमिका निभाता है। हम जो कुछ भी खाते या पीते हैं, वह सभी यकृत से होकर गुजरता है। यह अंग मानव शरीर में लगभग 500 प्रकार की जैविक क्रियाओं में भागीदारी निभाता है। इसलिए यकृत के बिना जीवित रहने की कल्पना नहीं की जा सकती और हमारा यकृत स्वस्थ बना रहे, इसके लिए इसकी उचित देखभाल बेहद जरूरी होती है। वर्तमान समय में शराब की लत, अनर्गल खान-पान और निष्क्रिय जीवनशैली हमारे यकृत को बीमार बना रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यकृत रोग भारत में होने वाली मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण है। यकृत के महत्व, इसमें होने वाले रोग और यकृत को सेहतमंद रखने संबंधी जागरुकता के उद्देश्य से हर वर्ष 19 अप्रैल को 'विश्व यकृत दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
yakrit ke karya
जैसा कि हमने ऊपर चर्चा की, जीवन को सुचारू रखने में सभी अंगों की भूमिका होती है। लेकिन कुछ अंग दूसरे अंगों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। यकृत ऐसा ही एक अंग है। यह अंग हमारे शरीर में प्रवेश करने वाले रोग संक्रमणों से मुकाबला करता है। रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखता है। रक्त के थक्का जमने में सहायता करता है। विषाक्त पदार्थों को शरीर से उत्सर्जित करता है। यकृत, एक महत्वपूर्ण द्रव 'पित्त' का स्राव भी करता है जो वसा को विखंडित कर पाचन में सहायक होता है।

यकृत के कार्य

यकृत का एक बहुत जरुरी काम है शरीर के खून को लगातार छानते रहना. यह खून उसके पास ह्रदय और आंत से आने वाली नसों से आता है. इस खून में ऑक्सीजन और बहुत सारे पोषक तत्व होते हैं. इसके बाद यकृत अपने अन्दर लौब्यूल नाम के हजारों छोटे-छोटे भागों की मदद लेता है. लौब्यूल इन पोषक तत्वों को छांटते हैं, उन्हें अन्य चीजों में बदलते हैं और अतिरिक्त तत्वों को जमा करते हैं. ये लौब्यूल खून में मौजूद ऑक्सीजन से यकृत के लिए ऊर्जा भी पैदा करते हैं. आंत से आने वाले खून में कार्बोहायड्रेट, फैट, विटामिन और अन्य पोषक तत्व होते हैं जो तुम्हारे खाने को पचाने के बाद मिलते हैं. इन्हें यकृत द्वारा अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किया जाता है.
यकृत काबोहायड्रेट को शर्करा में बदल देता है. खून छानने के बाद यह शर्करा नसों के जरिए पूरे शरीर में भेज दी जाती है. इस शर्करा की मदद से ही हमें ऊर्जा मिलती है. कभी-कभी शरीर को सारी शर्करा नहीं चाहिए होती है. इस बची हुई अतिरिक्त शर्करा को यकृत जमा कर लेता है ताकि बाद में जरुरत के वक्त इसका इस्तेमाल किया जा सके. मगर यकृत में आने वाले खून में केवल पोषक तत्व ही नहीं होते हैं. उसमें कुछ ऐसे तत्व भी होते हैं जो शरीर को पहुंचाते हैं या शरीर के किसी काम के नहीं होते. इन चीजों पर यकृत हमेशा पैनी निगाह रखे रहता है. जब ऐसी ही कोई नुकसानदायक या बेकार चीज यकृत को मिल जाती है, तो वह उसे ऐसे पदार्थ में बदल देता है जो शरीर को नुकसान न पहुंचा सके, या उसे अलग कर बाहर निकाल देता है.
यकृत से बाहर निकाला हुआ यह पदार्थ गुर्दो या आंत को भेज दिया जाता है ताकि वह मूत्र या मल के साथ शरीर से बाहर निकाला जा सके. पर हम यकृत को एक कारखाना नहीं मान सकते अगर वह नई चीजें न बनाता हो...
यकृत एक प्रोटीन बनाता है जो फैटी एसिड को शरीर के अलग-अलग भागों में ले जाता है. यह प्रोटीन शरीर के कट जाने पर खून को जमाने में भी मदद करता है. यकृत कोलेस्ट्रोल बनाता है जो शरीर को जरुरी हॉर्मोन बनाने में मदद करता है. इसके अलावा यकृत विटामिन D और पाचन में मदद करने वाले रसायन बनाता है. मगर यकृत जो सबसे जरुरी रसायन बनता है वह है पित्त रस या बाइल. पित्त रस भोजन को पचाने के लिए बहुत जरुरी होता है. यकृत में मौजूद कुछ ख़ास कोशिकाएं पित्त रस बनाती हैं. 
जब यह पित्त रस बनता है तो उसे पित्ताशय में जमा कर लिया जाता है. यहाँ से पित्त रस को धीरे-धीरे आंत में छोड़ा जाता है ताकि भोजन से फैट को पचाया जा सके, नुकसानदायक सूक्ष्मजीवों को मारा जा सके और पेट के अतिरिक्त अम्ल को बेअसर किया जा सके. इसके अलावा पित्त रस शरीर से नुकसानदायक तत्वों को बाहर भी निकालता है. तो देखा, हमारा यकृत एक शानदार कारखाना है जो बहुत सारे जरुरी काम करता है!
मगर इतने जटिल कारखाने की देखभाल भी बहुत जरुरी होती है. उसे नुकसानदायक चीजें, जैसे शराब, से बचाना होता है. वरना हमारा यह ताकतवर कारखाना बंद पड़ जाएगा!
  • यकृत मुख्य ऊष्मा उत्पादन करने वाला अंग हैं।
  • लसीका के निर्माण का प्रमुख केंद यकृत हैं।
  • ग्लूकोज से बनने वाले ग्लाइकोजन को संग्रहित करना।
  • ग्लाइकोजन की आवश्यकता होने पर ग्लूकोस में परिवर्तित होकर रक्तधारा में प्रवाहित हो जाता है।
  • पचे हुए भोजन से वसाओं और प्रोटीनों को संसिधत करने में मदद करना।
  • रक्त का थक्का बनाने के लिये आवशक प्रोटीन को बनाना।
  • भ्रुणिय अवस्था में या गर्वावस्था में यह रक्त (Blood) बनाने का काम भी करता है।
  • पित्त लवण और पित्त वर्णक का स्रवण करता है।
  • रक्त से रक्तिम-पित्तवर्णकता को अलग करता है।
  • गैलेक्टोज को ग्लूकोज में परिवर्तित करता है।
  • कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन को वसा में परिवर्तित करता है।
  • एंटीबॉडी और प्रतिजन का निर्माण करता है।
  • विटामिन B12 के संचय के लिए यकृत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • शरीर में विटामिन B12 लाल रक्ताणुओं के पर्याप्त निर्माण के लिए अति आवश्यक होता हैं।
  • यकृत में कैरोटिनॉइड पिंग्मेंट से विटामिन A का निर्माण होता हैं इसके अलावा वसा में घुलनशील विटामिन A, D, E, K होते हैं।
  • विटामिन k कुछ भोज्य पदार्थों में उपस्थित रहता है और बैक्टीरिया द्वारा आंतों में भी बनता है इसे प्रोथ्रोम्बिन बनाने के लिए यकृत में शोषित होना पड़ता है।
  • यकृत हमारे शरीर में ग्लाईकोजन, आयरन, वसा, विटामिन ए व डी का भण्डारण भी करता है।
  • शरीर से औषधियों, विषों, भारी धातुओं तथा टिन और पारद आदि को बाहर निकालने में सहायक है।
  • विषहरण (Detoxification) डीटॉक्सीफिकेशन इसका अर्थ हैं शरीर के आन्तरिक तंत्र को भोजन में मौजूद विषैले और हानिकारक रसायनों से मुक्त करना।
  • भ्रूण में यकृत RBC का निर्माण करता हैं वयस्क में यह आयरन, कॉपर और विटामिन B12 (एंटी एनिमिक फैक्टर) को संचित रखता हैं और RBC और हीमोग्लोबिन निर्माण में सहायक करता हैं।

यकृत संबंधी रोग

आमतौर पर यकृत से जुड़े रोग बहुत जल्द अपने लक्षण प्रकट नहीं करते। जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है, तब कहीं जाकर रोग के स्पष्ट लक्षण सामने आते हैं। भूख न लगना, वजन में गिरावट और पीलिया ऐसे कुछ सामान्य लक्षण होते हैं। यह अंग काफी समय तक प्रतिकूलताओं को झेलता रहता है।
यकृत मानव शरीर का बेहद व्यस्त और क्रियाशील अंग है इसलिए विभिन्न रोगों के लिए यह अत्यंत संवेदनशील भी होता है। हैपेटाइटिस यकृत से जुड़ी एक आम स्वास्थ्य समस्या है
और यह सामान्यतः एक विषाणुजनित रोग होता है। हैपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई इसके सर्वाधिक सामान्य संक्रमण प्रकार होते हैं। यकृत में सूजन आना हैपेटाइटिस का एक अहम लक्षण है। विषाणु संक्रमण के अलावा शराब पीने से भी यह रोग लग जाता है। यह रोग बिना किसी लक्षण या बहुत ही मामूली लक्षणों के साथ हमारे शरीर में पनप सकता है। पीलिया, भूख की कमी और बेचैनी हैपेटाइटिस के मुख्य लक्षण हैं। यह रोग दो प्रकार का होता है एक्यूट और क्रोनिक। हैपेटाइटिस बी या हैपेटाइटिस सी विषाणु से होने वाले क्रोनिक संक्रमण यकृत कैंसर को जन्म देते हैं। पूरी दुनिया सहित भारत में भी यकृत कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

सिरोसिस
यकृत रोग की एक जटिल स्थिति को 'सिरोसिस' कहते हैं। इसमें यकृत की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। फलस्वरूप यकृत में घाव बन जाते हैं जो ठीक नहीं होते। शराब और वायरल हैपेटाइटिस बी व सी सिरोसिस के मख्य कारण होते हैं। कमजोरी, थकान, भूख में कमी, पीलिया और खजली जैसे लक्षणों से सिरोसिस की पहचान होती है। शारीरिक जांच, खून की जांच और लिवर बायोप्सी के द्वारा लिवर सिरोसिस को डायग्नोस किया जाता है। पेट, कुल्हे, जांघ, पैरों और टखनों में सूजन, हिपेटोरीनल सिंड्रोम तथा यकृत कैंसर सिरोसिस की विशेष जटिल दशाएं होती हैं। लिवर सिरोसिस का कोई संपूर्ण इलाज नहीं है। यदि यह रोग अधिक बढ़ जाए तो पीड़ित व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा 6 महीने से लेकर 2 साल रह जाती है। यदि लिवर सिरोसिस से प्रभावित व्यक्ति को गंभीर जटिलताएं नहीं हैं । तो उसे 12 साल तक जीवित रहते हुए देखा । गया है। यह रोग कई लोगों में लिवर कैंसर के
जोखिम को बढ़ाता है। यह दो प्रकार से उत्पन्न होता है। पहला यकृत में ही ट्यूमर बन जाता है और दूसरा शरीर के किसी दूसरे हिस्से में उत्पन्न होकर यकृत तक पहुंच जाता है। यकृत कैंसर के सबसे सामान्य लक्षण होते हैं पेट में दर्द व सूजन, यकृत के आकार में वृद्धि, वजन में गिरावट और बुखार।
लिवर सिरोसिस के कुछ मरीजों को कई वर्षों बाद सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। यह स्थिति 'हिपेटोपल्मोनरी सिंड्रोम' कहलाती है जिसमें कुछ हॉर्मोन के स्राव की वजह से फेफडे ठीक से काम नहीं करते। इसके अलावा कुछ लोगों के यकृत में कुछ निश्चित विषाक्त पदार्थों का जमाव वंशानुगत रूप से होने लगता है। इस कारण भी यकृत कोशिकाएं नष्ट होकर सिरोसिस उत्पन्न करती हैं। यकृत में आयरन के जमाव (हीमोक्रोमेटोसिस) या कॉपर के जमाव (विल्सन रोग) से यकृत सिरोसिस हो जाता है। हीमोक्रोमेटोसिस में व्यक्ति के भोजन से आयरन की अधिक मात्रा अवशोषित होती है और अवशोषण की यह प्रवृत्ति वंशानुगत होती है। यह आयरन समय के साथ शरीर के अनेक अंगों में इकट्ठा होता जाता है जो कि लिवर सिरोसिस, गठिया, हृदय मांसपेशी क्षति जैसी स्वास्थ्य समस्याओं को उत्पन्न करता है। इसी तरह विल्सन रोग में उस प्रोटीन में वंशानुगत असामान्यता आ जाती है जो हमारे शरीर में कॉपर के अवशोषण को नियंत्रित करता है। ऐसी दशा में यह एक्स्ट्रा कॉपर यकृत, आंखों और । मस्तिष्क में जमा होने लगता है।

हैपेटाइटिस
हैपेटाइटिस यकृत की एक सामान्य वायरल बीमारी है। यह मुख्य रूप से पांच प्रकार का होता है। हैपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई। हैपेटाइटिस ए वायरस से प्रभावित व्यक्ति के मल से संदूषित खाद्य पदार्थ या पानी के संपर्क में आने पर यह रोग होता है। बुखार, थकान, उल्टी, भूख की कमी, पेट दर्द, पीलिया आदि इसके प्रमुख लक्षण होते हैं। व्यक्तिगत स्वच्छता और वैक्सीनेशन इससे बचाव के उपाय हैं। हेपेटाइटिस बी वायरस मुख्यतः खून के संपर्क (इंजेक्शन या रेजर द्वारा) और यौन संबंध से संचारित होता है। इसके लक्षण हैपेटाइटिस ए रोग जैसे होते हैं। वैक्सीन इसका बचाव है। संक्रमित खून या सुई के संपर्क में आने से हैपेटाइटिस सी का संक्रमण होता है और इसके लक्षण हैपेटाइटिस ए, बी के समान होते हैं। हैपेटाइटिस डी रोग का वायरस संक्रमित खून के रास्ते हमारे शरीर में प्रवेश करता है। इसकी एक और खास बात है, वो यह कि जो व्यक्ति पहले से हेपेटाइटिस बी से संक्रमित होता है, उसे ही हैपेटाइटिस डी होता है। हैपेटाइटिस ए की तरह संदूषित खाद्य पदार्थों व पानी से हैपेटाइटिस ई होता है। गर्भवती महिलाएं इस रोग के लिए सर्वाधिक संवेदनशील होती हैं जिनमें लिवर फेल्योर और मृत्यु का जोखिम उत्पन्न हो जाता है।
इस प्रकार स्वच्छता की आदतें अपनाकर, विसंक्रमित रक्तदान और सुरक्षित यौन संबंध के द्वारा विभिन्न प्रकार के हैपेटाइटिस से रोकथाम की जा सकती है। हैपेटाइटिस ए, बी और डी का इलाज वैक्सीन द्वारा किया जा सकता है, परंतु हैपेटाइटिस सी के लिए कोई वैक्सीन नहीं है। क्रॉनिक हैपेटाइटिस बी या सी होने पर प्रभावित व्यक्ति की सेहत ज्यादा बिगड़ जाती है। चूंकि हैपेटाइटिस वायरस यकृत पर असर डालते हैं। इसलिए इनसे सिरोसिस तथा यकृत कैंसर होने का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए हैपेटाइटिस के कोई भी लक्षण आपको दिखाई दें तो अविलंब डॉक्टर का परामर्श लेना चाहिए।

यकृत प्रत्यारोपण

यकृत कैंसर या सिरोसिस जैसे मामलों में जब यकृत पूरी तरह काम करना बंद कर दे तो इसके प्रत्यारोपण की बात आती है। मृत व्यक्ति के स्वस्थ यकृत को और जीवित व्यक्ति के यकृत के वांछित हिस्से का प्रत्यारोपण किया जाता है। जीवित व्यक्ति के यकृत का कोई निश्चित हिस्सा निकालने के बाद वह हिस्सा रिजेनरेट हो जाता है। यकृत प्रत्यारोपण के बाद कई बार अनेक जटिलताएं भी आती हैं। रक्तस्राव, संक्रमण, प्रत्यारोपित यकृत को शरीर द्वारा स्वीकार नहीं करना, ऐसी ही कुछ जटिलताएं हैं। इन जटिलताओं से बचाव के लिए अक्सर मरीज को उम्र भर डॉक्टरी सलाह पर दवाएं खानी पड़ती हैं। इन एंटीरिजेक्शन दवाओं द्वारा कई बार प्रभावित व्यक्ति में मधुमेह, पेचिश, सिर दर्द, रक्त दाब जैसे साइड इफेक्ट प्रकट होते हैं।

शराब छोड़ें और लिवर को फैटी होने से बचाएं!
शराब यकृत का दुश्मन है। शराब का अधिक सेवन यकृत कोशिकाओं को नष्ट करता है। बरसों तक ज्यादा मात्रा में रोजाना शराब पीने से लिवर सिरोसिस और फैटी लिवर की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। सूजन के साथ फैटी लिवर की स्वास्थ्य समस्या को 'एल्कोहलिक हैपेटाइटिस' कहते हैं। जब यकृत में वसा का जमाव होता है तब फैटी लिवर की परेशानी खड़ी होती है। वैसे तो यकृत में वसा की अल्प मात्रा सामान्य दशा है लेकिन यह मात्रा यदि बढ़ जाए तो यह हमारी सेहत के लिए चुनौती बन जाता है। हमारे भोजन और पेय पदार्थों से पोषक तत्वों को अलग करने में तथा खून से हानिकारक पदार्थों को छानकर उत्सर्जन के लिए आगे भेजने में यकृत की अहम भूमिका होती है। वसा की अत्यधिक मात्रा होने से यकृत सूज जाता है और उसमें घाव बन जाते हैं। फैटी लिवर की गंभीर दशा में यकृत काम करना बंद कर सकता है। अगर कोई व्यक्ति बहुत अधिक शराब पीता है और
उसे फैटी लिवर की शिकायत आती है तो उसे । 'एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज' (AFLD) कहते हैं। कुछ लोग जो बहुत ज्यादा शराब तो नहीं पीते, फिर भी उन्हें फैटी लिवर हो जाता है। यह स्थिति 'नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज' (NAFLD) कहलाती है। अधिकांश मामलों में फैटी लिवर वाले व्यक्ति में कई बार इस रोग के कोई स्पष्ट लक्षण प्रकट नहीं होते। लेकिन यदि आप अक्सर थकान महसूस करें, पेट के ऊपर दाहिनी ओर दर्द या बेचैनी मालूम हो तो यह फैटी लिवर का संकेत हो सकता है। जब वसा की बढ़ी हुई मात्रा को यकृत कुशलता से हजम नहीं कर पाता तो यह अतिरिक्त वसा हमारी यकृत कोशिकाओं में इकट्ठा होने लगती है। यहीं से फैटी लिवर की बीमारी शुरू होती है। अधिक मात्रा में शराब पीने से एल्कोहॉलिक फैटी लिवर हो जाता है लेकिन कम शराब पीने वाले भी इस रोग से नहीं बच पाते। दूसरे प्रकार के फैटी लिवर का स्पष्ट कारण अभी ज्ञात नहीं है। वैसे मोटापा, उच्च रक्त शर्करा और रक्त में वसा (खासतौर पर ट्राइग्लिसराइड) के उच्च स्तर को इसके मुख्य संभावित कारणों में गिना जाता है। गर्भावस्था, वजन में तेजी से कमी आना. हैपेटाइटिस सी और कछ दवाओं के साइड इफेक्ट से भी नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज होते हुए पाया गया है।
डॉक्टर फैटी लिवर से प्रभावित व्यक्ति के पेट को बाहर से दबाकर यकृत के सूजन की जांच करते हैं। अगर फैटी लिवर से यकृत का आकार बढ़ा हुआ है तो इसका अंदाजा लग जाता है। लेकिन कई बार यकृत का आकार बड़ा हुए बिना लिवर फैटी हो जाता है। इसमें पेट को छूकर डॉक्टर इसका पता नहीं लगा पाते। इसके लिए खून की जांच, लिवर बायोप्सी आदि से इस बीमारी का पता लगाया जाता है। जीवनशैली में बदलाव लाकर यह बीमारी दूर की जा सकती है। शराब छोड़कर या इसे कम करके, वजन घटाकर और आहार में परिवर्तन करके फैटी लिवर को धीरे-धीरे ठीक किया जा सकता है।

यकृत को स्वस्थ रखें इस तरह

लोगों को अक्सर गलतफहमी होती है कि केवल शराब पीने से लिवर खराब होता है। शराब के अलावा हमारे भोजन का स्वरूप भी यकृत को अस्वस्थ बनाता है। रेड मीट और दूसरे कई जंतु आहारों में सैचुरेटेड वसा पाई जाती है। अनेक प्रकार के प्रोसेस्ड फूड में ट्रांस फैट मौजूद होते हैं। रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, मिठाई, सफेद चावल व ब्रेड इन सभी के सेवन पर नियंत्रण रखना यकृत स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। फल, सब्जी, दालें और साबूत अनाज जैसे पादप आधारित खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल करना यकृत स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। संतुलित और उचित आहार के साथ-साथ ब्रिस्क वॉकिंग तथा नियमित व्यायाम से भी हमारा यकृत निरोगी रहता है। आइये, यकृत का ख्याल रखते हुए अपने को स्वस्थ रखें।

विश्व यकृत दिवस के मुख्य संदेश

यकृत हमारे शरीर के ढेरों काम अकेला करता है और अनेक दबावों को झेलता रहता है। स्थिति जब बेकाबू हो जाती है, तभी जाकर यकृत फेल्योर का संकट उभरकर सामने आता है। सादगी भरी जीवनशैली अपनाकर यकृत को दुरुस्त रखा जा सकता है। विश्व यकृत दिवस हमें इन्हीं बातों का संदेश देता है। इस खास दिवस का उद्देश्य आमजन को यकृत स्वास्थ्य के लिए जागरूक बनाना है।
यकृत को निरोगी रखने के लिए इस दिवस के प्रमुख संदेश यहां उल्लिखित हैं:-
  • सेहतमंद और संतुलित आहार लें और नियमित रूप से व्यायाम करें। सरल शब्दों में कमाई के साथ-साथ खर्चा भी करें। उचित पोषण के साथ व्यायाम एवं वर्कआउट द्वारा कैलोरी बर्न करते रहें।
  • निष्क्रिय जीवनशैली को त्यागकर सक्रिय जीवनशैली अपनाएं।
  • सभी प्रमुख खाद्य समूहों जैसे कि अनाज, दुग्ध उत्पाद, फल सब्जी आदि की समुचित मात्रा अपने आहार में शामिल करें।
  • ताजा फल-सब्जी और मोटे अनाज का पर्याप्त सेवन करें क्योंकि इनमें रेशे प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। रेशे यकृत स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक हैं।
  • भोजन में हल्दी का प्रयोग करें।
  • शराब, सिगरेट और ड्रग्स यकृत कोशिकाओं को नष्ट करते हैं।
  • यहां तक कि पैसिव स्मोकिंग भी हानिकारक है। इसलिए इनके सेवन से दूर रहें।
  • बिना डाक्टरी सलाह के मेडिकल स्टोर से दवा लेकर खाना घातक होता है। ऐसी कई दवाएं यकृत की हानि पहुंचा सकती हैं। इसलिए डॉक्टर के परामर्श पर ही दवाओं का सेवन उचित होता है।
  • एरोसॉल, कीटनाशक जैसे विषाक्त रसायन भी यकृत कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
  • मोटापे का प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव यकृत पर ही होता है। इसके कारण नॉन-एल्कोहलिक यकृत रोग होते हैं। इसलिए शारीरिक वजन को नियंत्रण में
  • रखना बेहद जरूरी है। एक प्रमाणित पैमाने के अनुसार हमारी सेंटीमीटर में जितनी ऊंचाई है, उसमें से 100 घटा देने पर जो संख्या बचे, उतना किलोग्राम हमारा वजन होना चाहिए।
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