अंतर्राष्ट्रीय व्यापार | antarrashtriya vyapar

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रस्तावना (INTRODUCTION)
'व्यापार' शब्द का अर्थ वस्तुओं तथा सेवाओं का लेन-देन करना है और जब यह लेन-देन विभिन्न देशों के बीच होता है तब इसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं। सभी देश अपने आप में आत्मनिर्भर नहीं होते। प्रकृति ने विभिन्न देशों को विभिन्न संसाधनों से सम्पन्न किया है। सामान्यतः एक देश के पास यदि कुछ संसाधन प्रचुर तथा आधिक्य मात्रा में पाए जाते हैं तो कुछ अन्य साधनों की दुर्लभता भी पाई जाती है।
उदाहरण के लिए, खाड़ी देशों के पास खनिज तेल उनकी आवश्यकता से बहुत अधिक पाया जाता है किंतु औद्योगिक वस्तुओं तथा खाद्यान्न की दुर्लभता उन्हें बहुत पीड़ित करती है। ऐसी स्थितियों में आप सीमा पार व्यापार द्वारा अपनी वस्तुओं के आधिक्य (surplus) के बदले उन वस्तुओं को प्राप्त कर सकते हैं जो आपके देश में या तो उपलब्ध नहीं हैं, या बहुत दुर्लभ हैं। अतः अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का निहितार्थ अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण है।
एक अर्थव्यवस्था जो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में संलग्न है, एक खुली अर्थव्यवस्था है। एक देश जो व्यापार में शामिल नहीं होता है उसे बंद अर्थव्यवस्था कहा जाता है और ऐसी स्थिति जिसमें कोई देश बिना किसी विदेशी व्यापार का संचालन करता है उसे स्वायत्तता कहा जाता है। अन्य देशों के साथ व्यापार से जो लाभ प्राप्त होते हैं उन्हें व्यापार से लाभ कहा जाता है।

पारस्परिक, अंतर-क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के बीच अंतर
प्रत्येक व्यक्ति को बिना व्यापार के आत्मनिर्भर होना होगा। यदि व्यक्ति सभी भोजन, कपड़े, आश्रय, चिकित्सा सेवाओं, मनोरंजन और विलासिता आदि का उत्पादन करेगा, लेकिन यह विशेष व्यक्ति के लिए असंभव है, इसलिए व्यक्ति के बीच व्यापार लोगों को गतिविधियों में विशेषज्ञ बनाने की अनुमति देता है। जिनमें वे अपेक्षाकृत अच्छी तरह से कर सकते हैं और उन वस्तुओं और सेवाओं को खरीदें जिन पर उनके द्वारा आसानी से उत्पादन नहीं किया जा सकता है। इसे पारस्परिक व्यापार कहा जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी पारस्परिक व्यापार पर आधारित है। प्रत्येक क्षेत्र आत्मनिर्भर होने के लिए मजबूर होगा यदि व्यापार इन क्षेत्रों के बीच मौजूद नहीं है। लेकिन व्यापार उस क्षेत्र में मौजूद है जहाँ प्रत्येक क्षेत्र उन वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन में विशेष कर सकता है जिनके लिए उसके पास कुछ प्राकृतिक संसाधन है, मैदानी क्षेत्र उस विशेष माल का उत्पादन कर सकते हैं जो प्राकृतिक संसाधनों में प्रचुर मात्रा में है। उदाहरण के लिए, मैदानी क्षेत्र विभिन्न खाद्यान्नों का उत्पादन कर सकते हैं जबकि पर्वतीय क्षेत्र खनन और वन उत्पादों के विशेषज्ञ हो सकते हैं।
इसलिए प्रत्येक क्षेत्र उस माल का उत्पादन करता है जिसमें उसके पास कुछ प्राकृतिक संसाधन हैं या लाभ प्राप्त किया है और व्यापार के अन्य उत्पादों को प्राप्त करता है जब सभी क्षेत्र आत्मनिर्भर होते हैं।
पारस्परिक और अंतर क्षेत्रीय सिद्धांत जिनका उल्लेख राष्ट्रों के मामले में किया गया है उनसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार उत्पन्न होता है। लगभग सभी देश अपने निवासियों की खपत की तुलना में कुछ वस्तुओं का अधिक उत्पादन करते हैं। इसी समय, वे उस विशेष वस्तुओं से अधिक का उपभोग करते हैं जिसका उत्पादन कर रहे हैं।
अन्तर्राष्टीय व्यापार उस लाभ को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है जो अन्तर्राष्ट्रीय विशेषता संभव बनाती है। व्यापार प्रत्येक व्यक्तिगत क्षेत्र या राष्ट्र को उन वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति देता है जो वस्तुओं और सेवाओं को प्राप्त करने के लिए व्यापार करते समय अपेक्षाकृत कुशल पैदा करते हैं कि वे दूसरों की तुलना में कम कुशलता से उत्पादन करेंगे।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से तात्पर्य अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण से है
व्यक्तिगत दृष्टिकोण से, विशिष्टीकरण से अभिप्राय किसी विशेष कार्य में अथवा किसी विशेष वस्तु के उत्पादन में विशिष्ट कौशल या निपुणता प्राप्त करने से है। एक अर्थव्यवस्था के संसाधनों के उपयोग से है जिनसे शेष विश्व की तुलना में देश को निरपेक्ष अथवा तुलनात्मक लागत लाभ प्राप्त है। जब देश के संसाधनों का उपयोग कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में किया जाता है तब विशिष्ट वस्तु का उत्पादन घरेलू जरूरतों से अधिक हो जाने की प्रवृत्ति रखता है। तब अधिशेष का निर्यात कर दिया जाता है।
दूसरी ओर, जब गैर-विशिष्ट क्षेत्रों से साधनों को वापस ले लिया जाता है तब देश की घरेलू जरूरतों के लिए कुछ वस्तुओं का उत्पादन कम पड़ता है। इसके फलस्वरूप इनके आयात की आवश्यकता पड़ती है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार-निर्यात एवं आयात-अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण का ही स्पष्ट परिणाम है। चूँकि अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण का सिद्धांत कुछ अर्थशास्त्रियों के सिद्धांतों पर आधारित है जो विभिन्न अर्थशास्त्रियों द्वारा दिए गए थे इसलिए अंतर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण का महत्त्व व्यापार से लाभ में है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के निर्धारक तत्त्व

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार या अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-
  • प्राकृतिक निधि - प्राकृतिक निधि अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण का आधार है। इससे अभिप्राय एक देश के उस संसाधन से है जो प्रकृति से निःशुल्क उपहार के रूप में प्राप्त होता है। प्राकृतिक निधि में प्रकृति और भूमि का उपजाऊपन तथा जलवायु सम्बन्धी स्थितियाँ भी शामिल होती हैं। इसलिए भारत और श्रीलंका ने चाय के लिए उपर्युक्त जलवायु स्थितियों के कारण चाय के उत्पादन में विशिष्टता प्राप्त की हुई है।
  • तकनीकी स्थिति - अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण का एक निर्णायक निर्धारक तत्त्व तकनीकी ज्ञान है। अपनी प्रौद्योगिकी के विकास के कारण, विश्व के विकसित देशों ने प्राकृतिक निधि की सभी रुकावटों पर काबू पा लिया है। उदाहरण के लिए, जापान केवल एक तटीय देश है जिसके पास न के बराबर प्राकृतिक संसाधन आधार है, परन्तु इसकी तकनीकी वरिष्ठता ने मोटरगाड़ी उत्पादन के क्षेत्र में एक बहुत ही विकसित देश की विशिष्टता प्राप्त कर ली है।
  • लागत अन्तर- उत्पादन की लागत में अन्तर, अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण का वास्तव में मुख्य आधार है। विभिन्न देश उन वस्तुओं के उत्पादन में विशिष्टता प्राप्त कर लेते हैं, जिनमें निरपेक्ष अथवा तुलनात्मक लागत अन्तर होता है। अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा का महत्त्वपूर्ण मापक उत्पादित वस्तुओं की लागत से अलग है।
  • नई आर्थिक प्रणाली- बहु-राष्ट्रीय निगमों के माध्यम तथा नई आर्थिक प्रणाली के उदय होने से विश्व बाज़ार के वैश्वीकरण (Globalisation) ने विभिन्न राष्ट्रों को शेष विश्व के साथ समन्वित होने के लिए बाध्य कर दिया है, जिससे विशिष्टीकरण और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का महत्त्व बढ़ गया है।

अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण अथवा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभ

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अथवा विशिष्टीकरण के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं-
  • प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग- अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण के कारण प्राकृतिक साधनों का संपूर्ण उपयोग किया जा सकता है। अल्पविकसित देश अपने खनिज पदार्थों का स्वयं उपयोग करने की स्थिति में नहीं है। ये देश अपने कच्चे माल का निर्यात विकसित औद्योगिक देशों में करते हैं।
  • सस्ती वस्तुएँ- अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण के कारण सभी देशों को कम कीमतों पर वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती हैं। इसका कारण यह है कि प्रत्येक देश उन वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनके बनाने में तुलनात्मक लागत कम आती है। तदनुसार अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण या व्यापार ने उच्च स्तर की खपत को सुविधाजनक बनाया और इसलिए जीवन की बेहतर गुणवत्ता हुई।
  • अतिरिक्त उत्पादन- अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण के कारण प्रत्येक देश को अपने अतिरिक्त उत्पादन को बेचने का अवसर मिलता है। कुछ देश वस्तुओं का उत्पादन अपनी आवश्यकता से अधिक कर लेते हैं। इन अतिरिक्त वस्तुओं को अन्य देशों में बेचकर कीमतों में होने वाली कमी को रोका जा सकता है।
  • थोक उत्पादन और पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ- अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण के कारण विभिन्न देश अकेले उन वस्तुओं के उत्पादन में विशेषज्ञ हैं जिनमें वे अनुकूल उत्पादन की स्थिति का आनंद लेते हैं। परिणामस्वरूप वस्तुओं का बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्थाओं के साथ कम कीमत पर बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जाता है। मक्कोनल के शब्दों में, “अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का ऐसा साधन है जिसके द्वारा राष्ट्र अपने संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि कर सकते हैं और इससे बड़े उत्पादन का एहसास हो सकता है।"
  • आर्थिक विकास की संभावना- किसी भी देश का आर्थिक विकास अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर निर्भर करता है। अल्पविकसित देश विकसित देशों से मशीनरी, तकनीकी ज्ञान तथा अन्य सहायक उपकरणों का आयात करके उपलब्ध प्राकृतिक साधनों तथा कच्चे माल का इष्टतम अथवा अनुकूलतम उपयोग कर सकते हैं। इस प्रकार उत्पादन के बढ़ाने में वे सक्षम हो सकते हैं और आर्थिक विकास की स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। रॉबर्टसन के अनुसार, "अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संवृद्धि का इंजन है।"
  • अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग- अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण विभिन्न देशों में परस्पर सहयोग की भावना को प्रोत्साहन देता है। यह व्यापारिक देशों के बीच सद्भावना, सौहर्दपूर्णता और मित्रता की भावना को जागृत करता है। हेनरी गोमज के शब्दों में, “अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण लोगों को सभ्य बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है।"

व्यापार से लाभ

व्यापार या दी गई लागत के साथ विशिष्टीकरण से लाभ
व्यापार से प्राप्त लाभ अलग-अलग सिद्धांत पर निर्भर करता है जिसके बारे में नीचे चर्चा की गई है। इस सिद्धांत के अनुसार विभिन्न देशों में विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन की लागत में अंतर होता है, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का मूल आधार है। लागतों में अंतर निम्न प्रकार का हो सकता है-

लागतों में निरपेक्ष अंतर
एड्म स्मिथ ने निरपेक्ष अंतर लागत सिद्धान्त दिया। इस सिद्धांत के अनुसार, विभिन्न देशों में विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन की लागत में निरपेक्ष अन्तर अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण व्यापार के पीछे मूल कारण है। लागतों में निरपेक्ष अन्तर उस समय पाया जाता है जबकि कोई एक देश किसी वस्तु को, दूसरे देश की तुलना में, काफी कम लागत पर उत्पन्न कर लेता है तथा दूसरा देश किसी अन्य वस्तु को पहले देश की तुलना में काफी कम लागत पर उत्पन्न कर लेता है। यह तब संभव होता है जबकि एक देश में विशेष प्रकार की भूमि, जलवायु, परिस्थितियाँ तथा सुविधाएँ पाई जाती हैं। इस प्रकार एक देश एक वस्तु के उत्पादन में विशिष्टता प्राप्त करके उसका अधिक उत्पादन करता है और उसका निर्यात करता है तथा दूसरी वस्तु का दूसरे देश से आयात करता है जिसमें कि दूसरा देश विशिष्टता प्राप्त करता है। इसको तालिका द्वारा आगे और स्पष्ट किया गया है-

दो देशों की लागतों में निरपेक्ष अन्तर

देश

चावल

गेहूँ

भारत

2

4

नेपाल

4

2

कुल

6

6


तालिका से स्पष्ट है कि भारत में श्रम की 1 इकाई द्वारा 2 इकाइयाँ चावल या 4 इकाइयाँ गेहूँ उत्पन्न किया जाता है, जबकि नेपाल में श्रम की 1 इकाई द्वारा 4 इकाइयाँ चावल या 2 इकाइयाँ गेहूँ उत्पन्न किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि
भारत में 1 इकाई चावल = 2 इकाइयाँ गेहूँ
नेपाल में 1 इकाई चावल = 0.5 इकाई गेहूँ

उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि भारत को गेहूँ के उत्पादन में और नेपाल को चावल के उत्पादन में निरपेक्ष लाभ प्राप्त है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की एक आवश्यक शर्त है कि दो देशों के बीच वस्तुओं की उत्पादन लागत का अनुपात भिन्न होना चाहिए।
भारत में गेहूँ के लिए चावल का लागत अनुपात 1:2 है और नेपाल में यह 1:0.5 है। यदि ये दोनों देश दोनों वस्तुओं का ही उत्पादन करें और परस्पर व्यापार न हो तो दोनों देशों में दो दिन के श्रम के फलस्वरूप गेहूँ का कुल उत्पादन 6 इकाइयाँ और चावल का कुल 6 इाकइयों का उत्पादन ही होगा। मान लीजिए भारत गेहूँ में तथा नेपाल चावल में विशिष्टता प्राप्त करते हैं और व्यापार करते हैं। इसे चित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
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ऊपर चित्र में AB नेपाल की और AC भारत की उत्पादन संभावना वक्र है। उत्पादन संभावना वक्र से यह ज्ञात होता है कि उत्पादन के साधनों की एक निश्चित मात्रा का उपयोग करने से किसी वस्तु की एक इकाई का अधिक उत्पादन करने के लिए दूसरी वस्तु की कितनी इकाइयों का त्याग करना पड़ेगा। इन रेखाओं के ढ़लान द्वारा विभिन्न वस्तुओं की अवसर लागत (opportunity cost) स्पष्ट हो जाती है अवसर लागत से अभिप्राय यह है कि किसी वस्तु की एक अधिक इकाई प्राप्त करने के लिए दूसरी वस्तु की कितनी इकाइयों का त्याग करना पड़ेगा। यह चित्र सामान लागत के नियम पर आधारित है। इसीलिए उत्पादन संभावना रेखाएँ सीधी रेखाएँ हैं। AB रेखा से ज्ञात होता है कि यदि नेपाल चावल की 1 इकाई का उत्पादन करता है तो उसे गेहूँ की 0.5 इकाई का त्याग करना होगा। इसलिए यदि उसे चावल की एक इकाई देकर गेहूँ की 0.5 इकाई से अधिक प्राप्त हो जाती है तो उसे लाभ होगा। इसी प्रकार AC रेखा से ज्ञात होता है कि यदि भारत चावल की 1 इकाई का उत्पादन करेगा तो उसे गेहूँ की 2 इकाई का त्याग करना पड़ेगा, इसलिए यदि भारत को गेहूँ की 2 से कम इकाई देने पर चावल की 1 इकाई प्राप्त हो जाती है तो भारत को गेहूँ का उत्पादन करने में लाभ होगा। चित्र में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से होने वाले लाभों को ABC क्षेत्र की सहायता से प्रदर्शित किया गया है। इन दोनों देशों में लाभ का बंटवारा दोनों देशों के बीच स्थापित व्यापार की शर्तों के आधार पर होगा। व्यापार की शर्ते प्रत्येक वस्तु के लिए सम्बन्धित देशों में अनुवर्ती माँग (Reciprocal Demand) द्वारा निर्धारित होती हैं।

तुलनात्मक लागत लाभ का सिद्धान्त
तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की विवेचना प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डों ने अपनी पुस्तक 'राजनीतिक अर्थव्यवस्था और कराधान के सिद्धान्त (Principles of Political Economy and taxation)', में की थी। इस सिद्धान्त को तुलनात्मक लाभ का सिद्धान्त भी कहा जाता है। रिकार्डों का तुलनात्मक लागत सिद्धान्त बतलाता है कि व्यापार करने वाले देशों को उस वस्तु के उत्पादन में विशिष्टता प्राप्त कर लेनी चाहिए जिसे वे दूसरी वस्तुओं की तुलना में कम लागतों पर उत्पादित कर सकते हैं। सिद्धान्त के अनुसार विशिष्टीकरण और स्वतन्त्र व्यापार न केवल सभी व्यापारिक सहभागियों को लाभ पहुँचाएगा, बल्कि उनको भी लाभ प्रदान करेगा जो निरपेक्ष रूप से कम कुशल उत्पादक है।

तुलनात्मक लागत का सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-
  • केवल दो देश हैं और वे दो वस्तुओं का उत्पादन करते हैं।
  • उत्पादन का एक मात्र साधन श्रम है और उत्पादन लागत को श्रम की इकाइयों में मापा जाता है।
  • श्रम की सब इकाइयाँ एक समान हैं।
  • उत्पादन पर समान प्रतिफल का नियम लागू होता है।
  • उत्पादन के साधन देश के अन्दर पूर्णतया गतिशील है, परन्तु दो देशों के बीच पूर्णतया गतिहीन है।
  • यातायात की कोई लागत नहीं है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सभी सरकारी नियन्त्रणों से मुक्त है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में लगे सभी देशों में पूर्ण रोजगार है।
  • वस्तु बाज़ार तथा साधन बाज़ार दोनों में पूर्ण प्रतियोगिता है।

लागतों में तुलनात्मक अन्तर
लागतों में तुलनात्मक अंतर डेविड रिकार्डों द्वारा दिया गया है। रिकार्डों के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का मुख्य कारण लागतों का तुलनात्मक अंतर है। लागतों के तुलनात्मक अंतर से अभिप्राय यह है कि एक देश दोनों ही वस्तुओं का उत्पादन अन्य देश की तुलना में कम लागत पर कर सकता है, परन्तु उसे दोनों में से एक का उत्पादन करने में तुलनात्मक लाभ अधिक है, जबकि दूसरी वस्तु के उत्पादन में तुलनात्मक लाभ कम है। दूसरा देश दोनों ही वस्तुओं का उत्पादन अधिक लागत पर करता है, परन्तु उसकी दोनों में से एक वस्तु का उत्पादन करने में तुलनात्मक हानि कम है जबकि दूसरी वस्तु का उत्पादन करने में तुलनात्मक हानि अधिक है।
तुलनात्मक लाभ से अभिप्राय उस लाभ से है जो एक देश अन्य देश की तुलना में एक वस्तु के उत्पादन में प्राप्त करता है जबकि अन्य वस्तुओं के रूप में उस वस्तु का उत्पादन अन्य देश की तुलना में कम लागत पर किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए दिल्ली में एक सबसे उत्तम वकील है जो एक बहुत अच्छा टाइपिस्ट भी है। उसका एक मुन्शी टाइप जानता है, परन्तु उसे वकालत का ज्ञान बहुत कम है। बेशक वकील दोनों कार्यों में योग्य है, परन्तु टाइप की तुलना में वकालत में अधिक समय लगाने से उसे तुलनात्मक लाभ अधिक होगा। मुन्शी दोनों कार्यों में ही अयोग्य है, परन्तु टाइप करने में उसकी तुलनात्मक हानि कम है। वकील को स्वयं वकालत करने तथा मुन्शी से टाइप कराने में अपेक्षाकृत लाभ अधिक होगा।
संक्षेप में, किसी देश को ए और बी दोनों वस्तुओं के उत्पादन में निरपेक्ष लागत का लाभ हो सकता है, फिर भी यह बी के बजाय ए में विशिष्टता का विकल्प चुन सकता है, क्योंकि ए, बी की तुलना में तुलनात्मक रूप से अधिक लागत लाभ प्रदान करता है।
इसे निम्नलिखित तालिका 1 द्वारा स्पष्ट किया गया है-

देश

गेहूँ

कपड़े

भारत

0.60 मी. कपड़ा

1.67 कि.ग्रा. गेहूँ

नेपाल

2.00 मी. कपड़ा

0.50 कि.ग्रा. गेहूँ


हम मानते हैं कि 1 किलोग्राम गेहूँ के उत्पादन का अवसर लागत भारत में 0.60 मीटर कपड़ा है, जबकि नेपाल में यह 2 मीटर कपड़ा है। इस तालिका का दूसरा स्तंभ फिर से वही जानकारी देता है, लेकिन 1 मीटर कपड़ा लागत के अवसर के रूप में व्यक्त किया गया है, जिसका भारत में गेहूँ उत्पादन में तुलनात्मक लाभ है और नेपाल कपड़े में है।
इसको चित्र द्वारा स्पष्ट किया गया है-
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AB भारत की उत्पादन संभावना रेखा तथा AC नेपाल की उत्पादन संभावना रेखा है। इसका अर्थ है कि भारत को 1 इकाई चावल प्राप्त करने के लिए एक इकाई गेहूँ का त्याग करना पड़ता है। नेपाल 1 इकाई चावल का त्याग करके 2 इकाइयाँ गेहूँ प्राप्त कर सकता है। स्पष्ट है कि भारत को चावल के उत्पादन में तुलनात्मक लाभ अधिक है तथा नेपाल को गेहूँ के उत्पादन में तुलनात्मक हानि कम है।

भारत नेपाल को चावल की 1 इकाई देकर गेहूँ की 1 इकाई से अधिक इकाई प्राप्त कर सकता है तथा नेपाल भारत को गेहूँ की 2 से कुछ कम इकाई देकर चावल की 1 इकाई प्राप्त कर सकता है। दोनों देशों को होने वाले लाभ छायादार भाग ABC द्वारा दिखाया गया है। इस लाभ का वितरण दोनों देशों के बीच विद्यमान व्यापार की शर्तों के आधार पर होगा। व्यापार की शर्तों का निर्धारण प्रत्येक देश की वस्तु की अनुवर्ती माँग के आधार पर होगा।
 

सिद्धान्त की आलोचनाएँ

रिकार्डों द्वारा प्रतिपादित तुलनात्मक लागत का सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। सैम्युअलसन के अनुसार, “तुलनात्मक लाभ के सिद्धान्त में सच्चाई की एक महत्त्वपूर्ण झलक दिखाई देती है। इस सिद्धान्त के तर्कपूर्ण दृष्टि से युक्तिसंगत होने पर भी इसके कई दोष हैं।
  1. केवल आदर्शात्मक सिद्धान्त- रिकार्डों का तुलनात्मक लागत का सिद्धान्त केवल एक आदर्शात्मक सिद्धान्त है। इससे यह ज्ञात होता है कि देश के साधनों का कुशलतम प्रयोग कैसे किया जा सकता है परन्तु यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की रचना अथवा निर्यातों एवं आयातों की व्याख्या करने में असमर्थ है तथा इनकी समस्याएँ कौन-सी हैं, इसको बतलाने में भी असमर्थ है। यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की एक वास्तविक विवेचना नहीं है।
  2. श्रम के मूल्य सिद्धान्त पर आधारित- तुलनात्मक लागत का सिद्धान्त श्रम के लागत सिद्धान्त पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी वस्तु की लागत इसके निर्माण के लिए आवश्यक श्रम की मात्रा पर निर्भर करती है। परन्तु वास्तव में किसी वस्तु की लागत पर, श्रम के अतिरिक्त, अन्य साधनों जैसे भूमि, पूँजी आदि की कीमत का भी प्रभाव पड़ता है। अतएव इस सिद्धान्त के आलोचक श्रम लागत के स्थान पर मुद्रा लागत के रूप में इसकी विवेचना करना पसंद करते हैं।
  3. परिवहन लागतों की अवहेलना- तुलनात्मक लागत सिद्धान्त में एक प्रमुख दोष यह है कि इसमें परिवहन लागतों पर विचार नहीं किया गया है। कुछ वस्तुओं की परिवहन लागतें उत्पादन लागतों से भी अधिक होती हैं। इसलिए वस्तुओं का आयात अथवा निर्यात करते समय उत्पादन लागत तथा यातायात लागत दोनों को मिलाकर कुल लागतों का विचार किया जाना चाहिए। यातायात लागते अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को काफी प्रभावित करती है, इसलिए इन लागतों की अवहेलना नहीं की जा सकती।
  4. स्थिर लागतों के नियम पर आधारित- इस सिद्धान्त की यह मान्यता, कि उत्पादन में कमी या वृद्धि करने पर प्रति इकाई उत्पादन लागत समान रहती है, अवास्तविक ही नहीं बल्कि अवैज्ञानिक भी है। सामान्यतया यह देखा गया है कि उत्पादन पर बढ़ती लागत का नियम या घटती लागत का नियम लागू होता है। स्थिर लागत के नियम के लागू होने की संभावना कभी-कभी और वह भी थोड़े समय के लिए होती है।
  5. पूर्ण विशिष्टीकरण की असंभावना- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भाग लेने वाले देशों का कुछ वस्तुओं में पूर्ण रूप से विशिष्टीकरण प्राप्त करना संभव नहीं है। मान लीजिए भारत और नेपाल व्यापार करते हैं। भारत सूती कपड़े के उत्पादन में तथा नेपाल ऊनी कपड़े से विशिष्टता प्राप्त करता है। नेपाल एक बहुत छोटा-सा देश होने के कारण भारत के ऊनी कपड़ों की माँग को पूरा नहीं कर सकता और न ही नेपाल में भारत से निर्यात हो सकने वाले कुल सूती कपड़े की माँग हो सकती है। इसलिए भारत को सूती कपड़ा तथा ऊनी कपड़ा दोनों ही बनाने पड़ेंगे। अतएव हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तभी संभव है यदि दो समान मूल्य वाली वस्तुओं का दो समान आकार वाले देशों में व्यापार हो।
  6. स्वतन्त्र व्यापार पर आधारित- परम्परावादी अर्थशास्त्री यह मान कर चलते थे कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सब प्रकार के प्रतिबन्धों से स्वतन्त्र है, परन्तु आधुनिक युग में स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। आज के युग में कोई भी देश दूसरे देश पर निर्भर रहना नहीं चाहता और अनिश्चिताओं से बचना चाहता है। इसके अतिरिक्त बहुत-सी अन्य परिस्थितियों जैसे अपूर्ण प्रतियोगिता, व्यापार प्रतिबन्ध, राज्य व्यापार, आयत-निर्यात तथा आर्थिक नियोजन के कारण स्वतन्त्र अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की संभावना कम है।
  7. स्थिर दशाएँ- इस सिद्धान्त में यह मान्यता भी निहित है कि दो देशों में लोगों की रुचियों तथा उत्पादन क्रियाओं में परिवर्तन नहीं आता। इसके अतिरिक्त भूमि, पूँजी तथा श्रम की पूर्ति स्थिर है। परन्तु वास्तव में संसार में इस प्रकार के परिवर्तन समय-समय पर होते रहते हैं इसलिए यह मान्यता निराधार है।
  8. एक पक्षीय- रिकार्डो का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का सिद्धान्त एक पक्षीय है। यह सिद्धान्त व्यापार की पूर्ति पक्ष को तो ध्यान में रखता है परन्तु माँग पक्ष की अवहेलना करता है। इस सिद्धान्त से यह तो ज्ञात होता है कि एक देश कौन-सी वस्तुओं का आयात तथा निर्यात करता है परन्तु यह ज्ञात नहीं होता कि व्यापार की शर्ते तथा विनिमय की दर कैसे निर्धारित होती है।

सारांश (SUMMARY)

इस अध्याय के अर्न्तगत यह स्पष्ट किया गया है कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार वर्तमान युग का आधार है क्योंकि वर्तमान में प्रायः सभी अर्थव्यवस्थाएँ खुली अर्थव्यवस्थाएँ हैं। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मुख्यतः अन्तर्राष्ट्रीय विशिष्टीकरण पर निर्भर करता है। लागतों में तुलनात्मक अंतर तथा सापेक्षिक अंतर होने की स्थिति में देश को व्यापार से लाभ प्राप्त होता है। लेकिन यदि लागतों में समान अंतर पाया जाता है तो उस स्थिति में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा।
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